यह दुर्भाग्यपूर्ण और हृदयद्रावक है: लखनऊ के आशियाना सेक्टर‑जी में रहने वाले 14 वर्षीय छात्र जफेद बाघ (उड़ीसा मूल) ने 27 जुलाई 2025 को एक ऐसा कदम उठाया, जिससे उसके माता‑पिता के जीवन में शून्य और पीड़ा भर गई। यह घटना अब सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह गई, बल्कि पूरे समाज को आत्मचिंतन के लिए मजबूर कर रही है।
कक्षा आठ का विद्यार्थी जफेद रात में मोबाइल गेम खेल रहा था, जिस पर उसकी माता, कुमोदिनी जी ने उसे डांट लगाई। उसके बाद जफेद अपने कमरे में चला गया। कुछ देर बाद उसकी मां ने कमरे में जाकर पाया कि उसी कमरे में जफेद पंखे में लगी रस्सी से झूल रहा था। उन्हें यह दृश्य इतनी तीव्रता से विचलित कर गया कि वे बेसुध हो गईं।
जफेद के पिता भारत के केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 93वीं बटालियन में तैनात हैं, और मई 2025 में लखनऊ स्थानांतरित हुए थे। परिवार मूलतः उड़ीसा का रहने वाला है; जफेद के बड़े भाई उड़ीसा में अपने दादा-दादी के साथ रहते हैं, जबकि छोटा भाई लखनऊ में ही माता-पिता के साथ रहा। इस पूरे मामले में परिवार ने किसी व्यक्ति विशेष पर दोषारोप नहीं किया, और पुलिस जांच जारी है।
एक जीवन की चुप गति, एक पुकार जो आज भी गूंजती है

जब एक मासूम बच्चा अपनी निराशा में ऐसी स्तब्ध कर देने वाली राह चुन लेता है, तो वह सिर्फ उसकी व्यक्तिगत हार नहीं होती—यह हमारी परवरिश, हमारी संवाद शैली और हमारी भावनात्मक संवेदनशीलता की असफलता की कहानी होती है।
हमारी सभ्यता ने मनोरंजन—यहाँ मोबाइल गेम—और शिक्षा के बीच एक बेमतलब की द्वंद्वरचना बना दी है। पर यह सवाल करना ज़रूरी है: क्या हम बच्चों की भावनात्मक दुनिया की कद्र करना भूल गए हैं? क्या सिर्फ डाँट के शब्द ही पर्याप्त समझे जाने लगे हैं?
– आवश्यक संवाद: सिर्फ डाँट नहीं, बच्चों के दृष्टिकोण को समझने के लिए संवाद और पूछताछ जरूरी है—क्या वे थक गए हैं, क्या वे अज्ञानता में बुराई की ओर भाग रहे हैं?
– संवेदनशील समर्थन: माता-पिता, शिक्षकों और समाज को बच्चों को सतत समर्थन देना चाहिए—जब वे असमर्थ महसूस करें, तो उन्हें अकेला न छोड़ें।
– मनोवैज्ञानिक मार्गदर्शन: ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अभिभावकों की संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक सलाह की आवश्यकता है कि कैसे अशांति को पहचानें और समाधान खोजें।
जफेद की इतनी छोटी उम्र में गई जान, उसके माता-पिता के जीवन में शाश्वत पीड़ा छोड़ गई—यह पीड़ा केवल भावनात्मक ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की भी पुकार है। इस घटना को हम एक क्षणिक त्रासदी की तरह न स्वीकार करें, बल्कि इसे एक चेतावनी के रूप में लें: बच्चों के प्रति हमारी जिम्मेदारी कितनी गहरी है।
जफेद की आत्महत्या सिर्फ एक व्यक्तिगत पतन नहीं, बल्कि एक समाज की घोर विफलता का दर्दनाक संकेत है। हमें खामोशी छोड़कर संवाद की ओर लौटना चाहिए, संवेदनशीलता की ओर लोटना चाहिए, ताकि दर्द के इस सिलसिले को एक बार फिर दोहराया न जाए।
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