उत्तर प्रदेश सरकार ने एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई है जिसके तहत सभी 75 जिलों में जैविक खेती और प्राकृतिक कृषि को प्रोत्साहित किया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य रासायनिक खेती पर निर्भरता कम करना, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करना है।
पंचगव्य उत्पादों पर केंद्रित रणनीति
इस योजना की सबसे खास बात है “पंचगव्य” पर आधारित कृषि उत्पादों का निर्माण और विपणन। पंचगव्य का अर्थ होता है गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और घी से बने मिश्रण। सरकार का मानना है कि इनसे तैयार उत्पाद जैविक खेती के लिए उर्वरक, कीटनाशक और ग्रोथ प्रमोटर के रूप में बेहद उपयोगी साबित होंगे।
महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ ग्रामीण रोजगार
योजना में ग्रामीण महिलाओं की अहम भागीदारी तय की गई है। राज्य के हर जिले में स्वयं सहायता समूह (SHGs) की महिलाओं को पंचगव्य उत्पादों के निर्माण, प्रशिक्षण और मार्केटिंग की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। इससे न केवल महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ेगी बल्कि स्थानीय स्तर पर युवाओं को भी रोजगार के अवसर मिलेंगे।
सरकारी दावा और विशेषज्ञों की राय
सरकारी प्रवक्ताओं का दावा है कि यह योजना खेती की उत्पादकता को 20% तक बढ़ा सकती है। साथ ही, खेती को पर्यावरण के अनुकूल और ज़हरमुक्त बनाने में अहम भूमिका निभाएगी। वहीं, कृषि वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का मानना है कि यह तभी संभव होगा जब प्रशिक्षण, संसाधन और बाज़ार तक उत्पादों की पहुंच को ठीक से विकसित किया जाए।
क्या होगी योजना की असली चुनौती?
इस योजना की सफलता सिर्फ घोषणाओं पर नहीं, बल्कि ज़मीनी क्रियान्वयन पर टिकी होगी। महिला समूहों को तकनीकी प्रशिक्षण, सुलभ ऋण, कच्चा माल और बाज़ार से जोड़ने की बड़ी ज़िम्मेदारी होगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार इन सभी चरणों को एक मजबूत ढांचे के तहत संचालित कर पाएगी?
युवाओं के लिए अवसर या अस्थायी व्यवस्था?
उत्तर प्रदेश गौ सेवा आयोग के ओएसडी अनुराग श्रीवास्तव के अनुसार, हाल ही में राज्य भर में पशुधन घनत्व, भूमि, जल संसाधनों और गौशालाओं का सर्वेक्षण किया गया है। इसके आधार पर स्थानीय युवाओं को ग्रोथ प्रमोटर और जैविक खाद के उत्पादन तथा बिक्री से जोड़ा जाएगा। लेकिन यह देखना होगा कि क्या यह अवसर स्थायी हैं या सिर्फ एक प्रोजेक्ट आधारित पहल।
पर्यावरण और कृषि सुधार का युग्म प्रयास
यह पहल तीन प्रमुख स्तंभों को एकसाथ जोड़ती है: पर्यावरण संरक्षण, रोजगार सृजन और कृषि सुधार। यदि वास्तव में जैविक खेती का क्षेत्रफल बढ़ता है तो जल, भूमि और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इससे न केवल किसानों को फायदा होगा, बल्कि उपभोक्ताओं को भी सुरक्षित और रसायन-मुक्त खाद्य सामग्री मिलेगी।
बाजार और मूल्य निर्धारण की चुनौती
जैविक खेती की सबसे बड़ी चुनौती है — उत्पादों को सही मूल्य पर बेचना। आज भी कई जैविक उत्पाद बाज़ार में महंगे हैं और किसान को अपनी उपज के उचित दाम नहीं मिलते। यदि सरकार पंचायत और ज़िला स्तर पर विपणन तंत्र विकसित कर सके तो यह योजना दूरगामी हो सकती है।
लंबी दूरी की सोच बनाम दिखावटी नीति
भारत में योजनाएं अक्सर सिर्फ कागज़ पर प्रभावशाली लगती हैं। कई बार राजनीतिक लाभ या प्रचार के लिए इन्हें शुरू किया जाता है लेकिन ज़मीनी तौर पर न तो प्रशिक्षण होता है, न निगरानी। इस योजना की सफलता इसी बात पर निर्भर करेगी कि प्रशासन इसे कितनी गंभीरता से लागू करता है।
निष्कर्ष: क्या वास्तव में बदलेगी खेती की दिशा?
उत्तर प्रदेश सरकार की यह पहल निश्चित ही एक सकारात्मक कदम है। लेकिन इसकी सफलता केवल पंचगव्य के प्रचार से नहीं, बल्कि उस पूरी आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती से होगी जो निर्माण से लेकर बाज़ार तक जाती है। यदि सही प्रशिक्षण, निगरानी, समर्थन और पारदर्शिता से इसे लागू किया जाए, तो यह मॉडल देशभर में अपनाया जा सकता है।
प्रश्न उठता है:
क्या हम इस बार खेती को वाकई प्राकृतिक और टिकाऊ दिशा में मोड़ पाएंगे या यह भी एक और सरकारी घोषणा बनकर रह जाएगी?
