प्रयागराज — एक ऐतिहासिक शहर, जिसकी पहचान कभी उसकी संस्कृति, शिक्षा, संगम और कुंभ से थी। लेकिन आज जब इस शहर की बात होती है, तो चर्चा विकास के नाम पर बर्बादी की होती है।
800 करोड़ रुपये की लागत से जिसे स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने का सपना दिखाया गया, वह आज खुद अपनी दुर्दशा का सबूत बना खड़ा है।
सवाल उठता है — क्या विकास केवल नाम बदलने तक सीमित रह गया है? इलाहाबाद को प्रयागराज बनाने में जिस तेजी और जोश का प्रदर्शन किया गया, वही ऊर्जा अगर सड़कों, सीवेज, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मूलभूत मुद्दों पर लगाई जाती, तो शायद आज प्रयागराज एक आदर्श शहर बनकर उभरता।
प्रशासनिक भ्रष्टाचार, अनियोजित योजनाएं और जनता से कटे हुए निर्णयों ने इस ऐतिहासिक शहर को गर्त में धकेल दिया है। शहर में आज भी जाम की समस्या विकराल है, सफाई व्यवस्था लचर है और पानी-बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं अक्सर ठप हो जाती हैं।
800 करोड़ की भारी भरकम रकम कहां गई? किसने खर्च किया? किस काम में लगी? और क्या उसके परिणाम ज़मीन पर दिखाई दे रहे हैं? इन सवालों का जवाब किसी फाइल या सरकारी रिपोर्ट में नहीं, बल्कि प्रयागराज की टूटी सड़कों, बहते नालों और गंदगी से अटी गलियों में छिपा है।
वक्त आ गया है कि उत्तर प्रदेश की जनता सवाल पूछे — सिर्फ चुनावों के समय नहीं, बल्कि हर उस दिन जब सरकार उनके पैसों से योजनाएं बनाकर उनके ही भविष्य से खिलवाड़ करती है।
जागो उत्तर प्रदेशवासियों, क्योंकि यह सिर्फ एक शहर की बात नहीं है, यह आपके हक़, आपकी आवाज़ और आपके भविष्य की लड़ाई है।
