लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) ने एक बार फिर यह साबित किया है कि आपातकालीन चिकित्सा में उनका कोई सानी नहीं। तीन साल का मासूम बच्चा, जिसके सिर में लोहे की छड़ आर-पार हो गई थी, ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहा था। सामान्य परिस्थितियों में यह हादसा असंभव-सा लगता, लेकिन KGMU के डॉक्टरों ने न केवल इस बच्चे को मौत के मुंह से बाहर निकाला, बल्कि यह संदेश भी दिया कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद की डोर नहीं टूटती।
सर्जरी बेहद जोखिमभरी थी। ज़रा सी चूक बच्चे की जान ले सकती थी। बावजूद इसके, न्यूरोसर्जरी विभाग के डॉक्टरों ने लगभग असंभव प्रतीत होने वाले ऑपरेशन को सफलता पूर्वक अंजाम दिया। यह केवल तकनीकी दक्षता ही नहीं, बल्कि मानवता और कर्तव्यनिष्ठा का भी उत्कृष्ट उदाहरण है।
लेकिन इस घटना का दूसरा पहलू हमें सोचने पर मजबूर करता है। एक छोटे बच्चे के सिर में लोहे की छड़ कैसे घुस गई? यह हमारे समाज और प्रशासन की लापरवाहियों पर सवाल खड़ा करता है। निर्माण कार्यों के दौरान सुरक्षा इंतज़ाम क्यों नहीं किए जाते? सार्वजनिक स्थानों पर फैली अव्यवस्था और सुरक्षा मानकों की अनदेखी ही ऐसे हादसों को जन्म देती है।
जहाँ डॉक्टरों ने बच्चे को नई ज़िंदगी दी, वहीं यह घटना हमें चेतावनी भी देती है कि हमें अपने परिवेश को सुरक्षित बनाने की दिशा में गंभीर कदम उठाने होंगे। स्वास्थ्य सेवाएँ चमत्कार कर सकती हैं, लेकिन हमारी प्राथमिक ज़िम्मेदारी है कि ऐसे हादसों की नौबत ही न आए।
KGMU की चिकित्सक टीम को यह श्रेय अवश्य मिलना चाहिए कि उन्होंने अपनी विशेषज्ञता और धैर्य से एक मासूम की ज़िंदगी बचाई। पर समाज और प्रशासन को यह नहीं भूलना चाहिए कि रोकथाम, उपचार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
