बाढ़ की मार झेल रहे गांवों में अब भी पानी और कीचड़ पसरा है। लोग छतों पर रातें काट चुके हैं, मवेशी डूब गए, खेत उजड़ गए। ऐसे में गृहमंत्री अमित शाह का दौरा होना था—खबर चैनलों ने पहले से ही इसे बड़ी कवरेज की तरह पेश किया। पर जब शाह वहां पहुंचे, तो अजीब नज़ारा सामने आया।
जिन “पीड़ितों” से मुलाकात का कार्यक्रम तय था, वहां कोई आया ही नहीं। भीड़ खाली, चेहरों पर खामोशी। तभी शाह ने अपने साथियों से कहा—“अरे यार, जा कर 4-5 लोगों को लेकर आओ।” जैसे त्रासदी की जगह पर भी भीड़ किराए की हो, और दर्द का भी इंतज़ाम करना पड़े।
यही भारतीय राजनीति की विडंबना है। कैमरे की चमक में राहत कार्य ढूंढना, और जनता के जख्मों को सिर्फ बैकग्राउंड बना देना। जिन किसानों की धान की फसल पानी में सड़ रही है, जिन घरों में बच्चों के लिए सूखी रोटी तक नहीं बची, उनकी आवाज़ सुनने के बजाय सत्ता का सारा जोर फोटोशॉप पर है।
गांव के लोग पूछते हैं—“क्या हमारी पीड़ा सिर्फ दिखावे के लिए है? क्या हमें तब ही देखा जाएगा जब कैमरे चालू हों?”
यह घटना सिर्फ एक दौरे की पोल नहीं खोलती, बल्कि उस राजनीति का चेहरा भी सामने लाती है जो असल सवालों से भागती है। बाढ़ राहत कितनी मिली, मुआवजा किसके खाते में पहुंचा, और पुनर्वास की योजना कब तक बनेगी—इन पर कोई चर्चा नहीं। बस हेडलाइनें बनती हैं: “गृहमंत्री ने किया दौरा।”
लेकिन असली सवाल यह है कि जिनकी दुनिया उजड़ गई, उनके लिए दौरे का मतलब क्या रहा? तस्वीरों का शोर या सच्ची राहत?
