August 31, 2025
akhilesh-yadav

उत्तर प्रदेश की हवाओं में इन दिनों एक अजीब-सी खामोशी तैर रही है। ये खामोशी है एक वीडियो की, जिसमें इंसानियत का सिर झुकाया गया और धर्म की कथित रक्षा के नाम पर किसी की अस्मिता का मुंडन कर दिया गया। इटावा के डंडारपुर गांव की इस शर्मनाक घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कथाओं की भूमि पर कट्टरता का बोलबाला है और संविधान की किताब पर धूल जमती जा रही है।

अब ज़रा दृश्य की कल्पना कीजिए — गाँव की गलियों में भागवत कथा हो रही है। कथा सुनने वाले, सुनाने वाले, सब कृष्णभक्ति में डूबे हैं। लेकिन जैसे ही कथावाचक की जाति पर सवाल उठता है, वही भक्ति कहीं खो जाती है। और फिर शुरू होता है वो दृश्य जो भगवान के नाम पर भी इंसान को शर्मसार कर दे।

संत सिंह यादव, कथावाचक — जिनके शब्दों से गांव का वातावरण गूंज रहा था, उनका सिर मुंडवा दिया जाता है। उनके सहयोगी पर पेशाब छिड़ककर उसे पवित्रता का प्रमाण पत्र दिया जाता है। औरतों से ज़मीन पर नाक रगड़वाई जाती है। क्या यही वो रामराज्य है जिसका सपना दिखाकर सत्ता के गलियारों में आज लोग कुर्सी पर विराजमान हैं?


अखिलेश यादव की हुंकार: ये भागवत कथा सबकी है

और इस माहौल में सन्नाटा तोड़ते हैं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव। उनके शब्दों में वो पीड़ा साफ झलकती है जो इस घटना ने दलित-पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और आम जनमानस को दी है।

“अगर सब लोग भागवत कथा सुन सकते हैं, तो सुना क्यों नहीं सकते?”

ये सवाल अखिलेश ने सत्ता के गाल पर तमाचा मारते हुए पूछा। उनका ये बयान उन तमाम वर्चस्ववादी मानसिकताओं पर सीधा हमला था जो आज भी धर्म को अपनी जागीर समझती हैं।

“अगर सच्चे कृष्ण भक्तों को भागवत कथा कहने से रोका जाएगा तो ये अपमान क्यों सहेगा कोई?”

अखिलेश ने इस पूरे प्रकरण को एक बड़े सामाजिक सन्दर्भ में रख दिया — जहाँ पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) समाज आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है, और सत्ता में बैठे लोग केवल जुमले उछालकर अपने नैतिक कर्तव्यों से मुँह मोड़ रहे हैं।


भाजपा सरकार पर तंज: रामनाम की लूट और इंसानियत की हार

“उत्तर प्रदेश की सत्ता ने धर्म की आड़ में सत्ता का सिंहासन तो सजाया, लेकिन उसी धर्म के नाम पर पिटती इंसानियत पर आंख मूंद ली। भागवत कथा हो या राम कथा, सबकी है… लेकिन यहां तो कथा का मंच भी जाति पूछकर तय किया जा रहा है।”

अखिलेश यादव की इस बात में वो कटाक्ष था जो भाजपा सरकार की असली पोल खोलता है:

“अगर पीडीए का कोई व्यक्ति मंदिर चला जाए तो ये लोग गंगाजल से धोते हैं। और वही लोग उनके दान को स्वीकार करते हैं। प्रभुत्वशाली लोगों को सरकार का आशीर्वाद मिला हुआ है, इसीलिए ये ऐसा करने की हिम्मत रखते हैं।”

सच पूछिए तो यह वही सरकार है जिसके माथे पर संविधान बचाने का दावा लिखा है और पाँव में संविधान कुचलने की लत।


पुलिस कार्रवाई: डैमेज कंट्रोल या न्याय का दिखावा?

वीडियो वायरल हुआ। सोशल मीडिया पर हंगामा मचा। पुलिस हरकत में आई। चार लोग गिरफ्तार हुए। वाह री हमारी कानून व्यवस्था — कैमरे की आंख खुलते ही इंसाफ का चश्मा पहन लिया गया, वरना इन रातों की दास्तां तो पता नहीं कितनी बार धुंध में खो जाती।

SSP ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव साहब की आवाज़ में मजबूरी झलक रही थी जब उन्होंने कहा:

“हां, घटना घटित हुई। केस दर्ज कर लिया है। चार आरोपी पकड़े गए हैं।”

लेकिन क्या यही न्याय है? क्या इस देश में किसी की जाति पूछकर उसका सिर मुंडवाना अब भी एक साधारण अपराध है? या ये लोकतंत्र के माथे पर कलंक है जो बार-बार धुलता नहीं, बस और गहरा होता जाता है?


वर्चस्व की मानसिकता और सत्ता की मौन स्वीकृति

डंडारपुर की गलियों में सिर्फ कथावाचक की आवाज नहीं दबाई गई, ये उस संविधान की प्रस्तावना का अपमान था जिसमें लिखा है: “हम भारत के लोग… सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करेंगे।”

यह घटना साफ इशारा करती है कि सरकार की चुप्पी एक प्रकार का मौन समर्थन है। एक ऐसा समर्थन जो वोट बैंक साधता है, लेकिन समाज की आत्मा को खोखला करता जा रहा है।

“अगर निष्पक्ष कार्रवाई हो, बाबा साहब के संविधान के मुताबिक फैसले हों, तो गांव, गरीब और अल्पसंख्यकों का सम्मान होगा।” — अखिलेश की यह बात भाजपा की शासन नीति पर गहरा प्रहार थी।


कथा का मोड़ और कथित रामराज्य की सच्चाई

तभी कहने को जी चाहता है
“यह वही रामराज्य है जहां कथा सुनाने वाले की जाति पूछकर उसे अपमानित किया जाता है, लेकिन सत्ता में बैठे लोग राम नाम पर सत्ता का अभिषेक करते रहते हैं।”

और सच यही है — 10 मिनट की तेज डिलीवरी, डिजिटल इंडिया, 5 ट्रिलियन इकॉनमी के शोर में अगर कोई सबसे ज्यादा पिटा है तो वो है इंसानियत और बराबरी का सपना।


आखिरी सवाल — भागवत कथा किसकी? धर्म किसका? देश किसका?

डंडारपुर में पीटा गया संत सिंह यादव का सिर दरअसल पूरे लोकतंत्र की उस व्यवस्था का प्रतीक है जहां जाति आज भी इंसानियत से बड़ी है।

तो सवाल उठता है:
👉 क्या भागवत कथा पर केवल एक जाति का अधिकार है?
👉 क्या मंदिर की देहरी पर जाने वाला हर पिछड़ा गंगाजल से शुद्धिकरण का मोहताज है?
👉 और सबसे बड़ा सवाल — क्या सत्ता की चुप्पी असल में इन घटनाओं को खाद-पानी दे रही है?


कथा की भूमि पर आज वो कथा दुहराई जा रही है जिसमें शिशुपाल जैसे लोग धर्म सभा में गालियां बकते हैं और सत्ता चुपचाप सुनती रहती है। फर्क बस इतना है कि अब कृष्ण की उंगली नहीं उठती।

कहानी अब भी वही है — कुछ प्रभुत्वशाली लोग सत्ता का आशीर्वाद पाकर धर्म को अपनी जागीर बना चुके हैं और इंसानियत का सिर फिर एक बार मुंडवा दिया गया।

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