पटना की दीवारें गवाह बन रही हैं उस गुस्से की जो अब धीरे-धीरे सिर्फ दिलों में नहीं, बल्कि सड़कों और दीवारों पर भी दिखने लगा है। सुबह होते-होते शहर की दीवारों पर कुछ पोस्टर लगे दिखे। कोई पार्टी का नाम नहीं, कोई संगठन की मोहर नहीं—लेकिन शब्द ऐसे जो सत्ता की चूलें हिलाने के लिए काफी हैं।
“बिहार में 70 हज़ार करोड़ का महाघोटाला।”
“घोटालेबाजों की सरकार, शर्म करो नीतीश कुमार।”
ये महज़ एक विरोध का तरीका नहीं है। यह एक संकेत है—कि जनता अब चुप नहीं है, कि सवाल पूछे जाएंगे, और जवाब न मिले तो जवाबदेही तय की जाएगी।
राजनीति और पोस्टरों की ताकत
भारत जैसे लोकतंत्र में, जहां हर नागरिक को बोलने का हक़ है, वहां दीवारें कई बार अख़बार से ज़्यादा सच बोलती हैं। ये पोस्टर किसने लगाए, यह अभी तक एक रहस्य है। न किसी पार्टी ने ज़िम्मेदारी ली है, न किसी संगठन ने सामने आकर दावा किया है।
लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इसके पीछे कोई सोच नहीं है। पोस्टरों का टोन, भाषा और समय इस ओर इशारा करते हैं कि यह कोई संगठित प्रतिक्रिया है—जो एक लम्बे समय से सरकार की नाकामी से पनप रही है।
70 हज़ार करोड़ का घोटाला—एक तथ्य या फूटता गुस्सा?
जिन विभागों का पोस्टरों में ज़िक्र किया गया है—ग्रामीण विकास विभाग, भवन निर्माण निगम, स्वास्थ्य विभाग—वो सबके सब ऐसे हैं जो सीधे जनता की ज़िंदगी से जुड़े हुए हैं। यही वे विभाग हैं जिन्हें सरकार हर बार “विकास” के मॉडल के रूप में पेश करती रही है।
लेकिन सवाल है—क्या विकास केवल आंकड़ों तक सीमित है? क्या बजट का पैसा सिर्फ PPT में दिखाने के लिए होता है? अगर ये आरोप सच हैं, तो इसका मतलब है कि गरीबों के घरों का बजट घोटालों में निगल लिया गया, अस्पतालों की दीवारें खड़ी होने से पहले ही भ्रष्टाचार में ढह गईं, और स्वास्थ्य सेवाएं कागजों पर ही “बेहतर” हो गईं।
नीतीश कुमार की सरकार—एक दौर से दूसरे दौर तक
नीतीश कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक सफर में कई बार सत्ता संभाली है। “सुशासन बाबू” के नाम से कभी बिहार को नई दिशा देने वाले नेता के रूप में उनकी छवि बनाई गई थी। लेकिन अब वही छवि धुंधली होती जा रही है।
हर नई पारी के साथ जनता को कुछ उम्मीदें थीं—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था में सुधार। लेकिन अब जब सत्ता का सफर 20 साल के करीब पहुँच रहा है, तो सवाल भी उतने ही भारी हो चुके हैं।
क्या नीतीश कुमार की सरकार थक चुकी है? या फिर सत्ता में टिके रहने की जुगत ने विकास को पीछे छोड़ दिया है?
विपक्ष की प्रतिक्रिया—राजनीति या सही दिशा?
बिहार में विपक्षी पार्टियाँ भी इस पोस्टर वॉर को लेकर चुप नहीं हैं। तेजस्वी यादव से लेकर कांग्रेस तक, सबने इसे मुद्दा बनाकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सवाल उठाना जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी है वैकल्पिक रास्ता दिखाना।
विपक्ष की आलोचना केवल इस बात पर नहीं टिकी रहनी चाहिए कि “सरकार गलत है,” बल्कि इस पर भी कि “हम क्या बेहतर कर सकते हैं।” नहीं तो यह सारा विरोध केवल चुनावी फायदा उठाने का तरीका बनकर रह जाएगा।
जनता की बेचैनी—बोलती दीवारें, चुप संसद
इन पोस्टरों में जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ है, वह एक आम नागरिक की भाषा है। न उसमें राजनैतिक शब्दजाल है, न सांस्कृतिक प्रतीक। यह भाषा है उस युवा की, जिसे आज भी अपने गांव से शहर जाने के लिए पक्की सड़क नहीं मिली। यह आवाज़ है उस महिला की, जिसने अपने बच्चे का इलाज इसलिए खो दिया क्योंकि अस्पताल में डॉक्टर नहीं था। यह सवाल है उस किसान का, जिसे योजना के पैसे तो मिले नहीं, लेकिन ऑडिट रिपोर्ट में उसका नाम ज़रूर था।
पोस्टर लगाना गलत या सही—यह बहस बहुत छोटी है। असली बहस यह होनी चाहिए कि क्या वाकई कुछ गड़बड़ है? और अगर है, तो सरकार इस पर चुप क्यों है?

पोस्टर या आंदोलन की शुरुआत?
बिहार में छात्र आंदोलनों का इतिहास रहा है। जेपी आंदोलन से लेकर मंडल कमंडल की राजनीति तक, युवाओं ने जब भी उठने का फैसला किया है, सत्ता को झुकना पड़ा है। आज फिर बिहार का युवा बेचैन है। न वह नौकरी से संतुष्ट है, न व्यवस्था से।
जब राजनीतिक पार्टियाँ अपना काम भूल जाती हैं, तब जनता ही पोस्टर बन जाती है, नारा बन जाती है, आंदोलन बन जाती है। इस बार की शुरुआत हो सकता है पोस्टरों से हुई हो, लेकिन इसका अंत कहां होगा, यह अब सरकार पर निर्भर करता है।
मीडिया—खबरों से ज़्यादा बयानबाज़ी
आज जब न्यूज़ चैनलों पर “डिबेट” हो रही होती है, तब वहां मुद्दा “घोटाला” नहीं, “कौन किसके साथ बैठा” होता है। ये वही मीडिया है जो किसी नेता की छींक पर “ब्रेकिंग न्यूज़” चला देता है, लेकिन जब 70 हज़ार करोड़ के घोटाले की बात सामने आती है, तब उसे “पोस्टरबाज़ी” कहकर टाल देता है।
क्या मीडिया की भूमिका केवल TRP तक सीमित रह गई है? क्या अब सच दिखाना “एंटी नेशनल” हो गया है?
एक सच जो कागज़ से निकलकर सड़क पर आया
इन पोस्टरों को केवल राजनीतिक हथकंडा मानकर खारिज करना आसान है, लेकिन ज़रूरी है कि इनकी भावना को समझा जाए। अगर सरकार वाकई साफ़ है, तो उसे तुरंत जवाब देना चाहिए। CAG रिपोर्ट्स को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और ज़िम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए—चाहे वे किसी भी पद पर हों।
क्योंकि अगर लोकतंत्र में सवाल पूछने की गुंजाइश नहीं रही, तो हम केवल वोटिंग मशीनों में बदल जाएंगे—सोचने वाले नागरिक नहीं।
बिहार के पोस्टर अब केवल प्रचार का साधन नहीं हैं—वे एक लाक्षणिक प्रतीक बन चुके हैं उस गुस्से के जो सड़कों, चाय की दुकानों, कॉलेजों और खेतों में पल रहा है। यह आवाज़ अब दबेगी नहीं। इसे नज़रअंदाज़ करना न केवल एक राजनीतिक भूल होगी, बल्कि एक सामाजिक अपराध भी।
अब वक्त है सरकार को जवाब देने का। क्योंकि अगर अब भी जवाब नहीं मिला—तो अगली बार ये पोस्टर दीवारों पर नहीं, शायद मतपेटियों में दिखेंगे।
