उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में एक नया कदम उठाया है—गौ-आधारित चिकित्सा पद्धतियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल करने का प्रयास। आयुर्वेद और पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियों की तरफ सरकार की यह झुकाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन जिस तरह से “गौ-संवेदित” उत्पादों जैसे गोमूत्र, गोबर और गौ-दुग्ध को अब औषधीय रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, उसने एक नई बहस को जन्म दे दिया है—क्या यह जनस्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है, या फिर यह धार्मिक एजेंडे को चिकित्सा में घुसाने की एक कवायद है?

उत्तर प्रदेश में कई सरकारी चिकित्सालयों और आयुर्वेदिक संस्थानों में अब गाय से संबंधित औषधियों को प्रचारित किया जा रहा है। इन उत्पादों में दावा किया गया है कि वे कैंसर, मधुमेह, रक्तचाप और यहां तक कि कोविड-19 जैसी बीमारियों में भी लाभकारी हैं। हालांकि, इन दावों के पीछे कोई व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन या क्लिनिकल ट्रायल मौजूद नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि क्या वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव में इस तरह की चिकित्सा को सरकारी समर्थन देना उचित है?
भारत की परंपरागत चिकित्सा, विशेषकर आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी पद्धतियों का इतिहास गौरवशाली रहा है। लेकिन हर परंपरा को विज्ञान की कसौटी पर परखना जरूरी होता है। जब तक किसी औषधि या उपचार की प्रभावकारिता को प्रमाणित नहीं किया जाता, तब तक उसे जनता पर लागू करना न केवल अनैतिक है, बल्कि खतरनाक भी हो सकता है।
यह भी देखा जा रहा है कि गौ-आधारित चिकित्सा को बढ़ावा देने के पीछे सरकार की नीति में धार्मिक प्रतीकों का अंधाधुंध उपयोग हो रहा है। गाय का भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन चिकित्सा का क्षेत्र धर्म से ऊपर होता है। जब कोई सरकार अपने धार्मिक विश्वासों को विज्ञान की जगह रखने लगती है, तो इससे समाज में वैज्ञानिक सोच को आघात पहुँचता है।
स्वास्थ्य एक सार्वभौमिक अधिकार है, और किसी भी इलाज को अपनाने से पहले वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता होती है। भारत जैसे देश में जहां करोड़ों लोग अब भी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं, वहां प्राथमिक चिकित्सा ढांचे को मजबूत करने के बजाय इस तरह की “परंपरा-प्रेरित चिकित्सा” को प्राथमिकता देना समझ से परे है।
उत्तर प्रदेश सरकार का यह कदम यदि शोध, परीक्षण और वैज्ञानिक मानकों के अधीन होता, तो इसका स्वागत किया जा सकता था। लेकिन वर्तमान स्थिति में यह एक प्रयोग प्रतीत होता है, जिसमें जनता को संभावित जोखिम के हवाले किया जा रहा है।
चिकित्सा में आस्था की नहीं, तर्क और प्रमाण की ज़रूरत होती है। परंपरा तब तक मूल्यवान है, जब तक वह वैज्ञानिक विवेक से टकराव न करे। सरकार का कर्तव्य है कि वह स्वास्थ्य को धर्म या संस्कृति का विषय नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच और जनकल्याण का साधन बनाए।
