झाँसी की धरती, जो रानी लक्ष्मीबाई की वीरगाथा की गवाह रही है, आज एक ऐसी शर्मनाक घटना से दागदार हो गई, जिसे सुनकर रूह काँप जाए। जाति और मज़दूरी के इस तालिबानी गठजोड़ ने न सिर्फ़ इंसानियत को लज्जित किया है, बल्कि यह भी साफ़ कर दिया है कि हमारे समाज में आज भी प्रभुत्ववादी मानसिकता किस हद तक जड़ें जमाए बैठी है।
घटना कुछ यूँ है—एक दलित युवक ने मेहनताना मज़दूरी से इन्कार किया। कारण चाहे जो भी रहा हो, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया पर जो सज़ा दी गई, वो किसी लोकतांत्रिक समाज में नहीं, बल्कि किसी बर्बर तालिबानी हुकूमत में दी जाती है। युवक को गाँव भर में गंजा करके घुमाया गया, उसे उल्टा लटकाया गया और जबरन पानी पिलाया गया। यह सब केवल इसलिए, क्योंकि उसने ‘हुक्म’ मानने से इनकार कर दिया था।
यह सवाल अब केवल एक युवक की नहीं है। यह सवाल पूरे समाज का है। क्या किसी भी जाति, किसी भी वर्ग का इंसान, अगर वह ‘न’ कह दे, तो क्या उसके साथ ऐसा व्यवहार उचित है? और यदि ऐसा हो रहा है तो यह किस समाज का प्रतिबिंब है?
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जातिवाद की ज़हरबुझी जड़ें
यादव, लोधी, ब्राह्मण, दलित, पिछड़ा, अगड़ा—ये शब्द अब केवल पहचान नहीं रहे, ये सत्ता के औजार बन चुके हैं। जब एक दलित व्यक्ति ‘मज़दूरी नहीं करूंगा’ कहता है, तो उसकी यह ‘न’ सिर्फ़ इनकार नहीं होती, यह उस व्यवस्था के मुँह पर तमाचा होती है जो सदियों से जातिगत श्रम व्यवस्था को बनाए रखती है।
ये कोई एक गाँव या एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह हमारे समाज के उस सड़ते हुए हिस्से की कहानी है, जिसे सत्ता संरक्षण मिल रहा है। जब प्रभुत्ववादी सोच को सत्ता का साथ मिल जाता है, तो ऐसी घटनाएं केवल अपराध नहीं रह जातीं, वे एक संदेश बन जाती हैं—“जो विरोध करेगा, उसका यही हाल होगा।”
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सरकार की चुप्पी क्या संकेत देती है?
आज जब देश डिजिटल इंडिया, चाँद मिशन, और विश्वगुरु बनने के सपने देख रहा है, तब झाँसी जैसी घटनाएँ हमें जमीनी सच्चाई से रूबरू कराती हैं। एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सारा तंत्र उन ताक़तों को संरक्षण दे रहा है जो समाज में भय, नफ़रत और असमानता का जहर घोल रहे हैं?
जिस प्रकार से सरकार और प्रशासन इस पर चुप है, यह चुप्पी केवल मौन नहीं है, यह मौन सहमति है। यह उस व्यवस्था की सहमति है जो पीड़ित की नहीं, बल्कि पापियों की रक्षा करती है। क्या यही ‘रामराज्य’ है, जिसकी दुहाई दी जाती है?
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PDA और INDIA गठबंधन की चुनौती
PDA यानी Pichda, Dalit, Alpsankhyak—ये वर्ग अब संगठित हो रहे हैं। INDIA गठबंधन अब केवल एक राजनीतिक गठबंधन नहीं रहा, वह उन आवाज़ों का मंच बन रहा है जिन्हें दबाया गया, कुचला गया और अपमानित किया गया।
2027 की लड़ाई सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन की नहीं होगी, वह व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई होगी। यह लड़ाई उस सोच के खिलाफ़ होगी जो मानती है कि कुछ लोग ‘हुक्मरान’ हैं और बाक़ी ‘हुक्म के गुलाम।’
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युवा पीढ़ी से सवाल
क्या हम वही पीढ़ी बनेंगे जो इंस्टाग्राम पर रील्स में “जो बोले सो निहाल” चिल्लाएगी, लेकिन जब किसी दलित को गंजा कर घुमाया जाएगा तो चुप रह जाएगी?
क्या हम वही समाज रहेंगे जहाँ ‘जात’ पूछकर दोस्ती की जाती है, और ‘पढ़ाई-लिखाई’ के बावजूद मानसिकता वही ग़ुलामों वाली है?
इस समय हमें सोचना होगा—क्या हमें एक ऐसा भारत चाहिए जो संविधान के अनुसार चले, या फिर वो भारत जो मनुस्मृति और भय के आधार पर चलता हो?
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निष्कर्ष: समाज का आईना या समाज की शर्म?
झाँसी की यह घटना एक आईना है, लेकिन हम इसमें अपना चेहरा देखने से डर रहे हैं। डर इसलिए कि यह चेहरा उतना सुंदर नहीं है जितना सोशल मीडिया पर फ़िल्टर करके दिखाते हैं। यह चेहरा बदसूरत है, ज़हरीला है, जातिवादी है।
अगर हम इस घटना पर मौन हैं, तो हम भी अपराधी हैं। अगर हम चुप हैं, तो उस युवक को गंजा करने वालों से कम नहीं हैं। अगर हम कुछ नहीं कहते, तो हम उस भारत के गुनहगार हैं, जिसके संविधान में “समता”, “न्याय” और “स्वतंत्रता” की शपथ ली गई थी।
अब फैसला हमें करना है—क्या हम एक लोकतंत्र बनाएंगे या फिर तालिबानी मानसिकता का भारत?
