बॉलीवुड की क्राइम थ्रिलर फिल्में अब महज़ एंटरटेनमेंट नहीं रह गईं, कुछ लोग तो इन्हें “क्राइम मैनुअल” समझकर असल ज़िंदगी में उतार रहे हैं। महाराष्ट्र के पालघर ज़िले से एक ऐसी ही ‘ड्रिश्यम’ स्टाइल हत्या सामने आई है, जिसने यह साबित कर दिया कि अब कल्पना और अपराध के बीच की रेखा खतरनाक रूप से धुंधली हो गई है।

नालासोपारा के गडगापाड़ा इलाके में रहने वाले 35 वर्षीय विजय चव्हाण बीते 15 दिनों से लापता थे। उनकी पत्नी, 28 वर्षीय कोमल चव्हाण के साथ उनका घरेलू विवाद चल रहा था, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि मामला इस हद तक जा चुका है।
सोमवार को जब विजय के भाइयों ने घर की तलाशी ली, तो उनकी नज़र फर्श पर बिछी कुछ नई टाइल्स पर गईं, जिनका रंग बाकी टाइल्स से मेल नहीं खा रहा था। शक हुआ, टाइल्स हटाईं, तो नीचे से निकली एक बनियान और लाश की बदबू—जिसने सब कुछ साफ़ कर दिया।
पुलिस को सूचना दी गई, और खुदाई के बाद विजय का शव उसी घर के फर्श के नीचे मिला—एकदम किसी फिल्मी सीन की तरह।
अब पुलिस की जांच में सामने आ रहा है कि विजय की हत्या में उसकी पत्नी कोमल का हाथ है, जो पिछले दो दिन से गायब है। और उसके साथ लापता है पड़ोसी मोनू—जिसके साथ उसका प्रेम संबंध बताया जा रहा है। दोनों ही इस जघन्य अपराध के मुख्य आरोपी माने जा रहे हैं।
अब सवाल यह है कि क्या फिल्मों से प्रेरणा लेकर अब अपराध रचे जा रहे हैं?
क्या अब ‘ड्रिश्यम’ जैसी कहानियां स्क्रीन से निकलकर सड़कों पर आ चुकी हैं?
क्या यह समाज का मनोरंजन के नाम पर अपराधीकरण नहीं है?
फिल्में जब दिमाग को मनोरंजन देती हैं, तब तक ठीक है। लेकिन जब वो दिल और ज़मीर को सुन्न करने लगें, और लोग उन्हें अपराध करने की गाइडबुक समझने लगें, तब ये मनोरंजन नहीं, चेतावनी बन जाती हैं।
पालघर की इस वारदात ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अपराध अब खून से पहले दिमाग में होता है—और वो दिमाग आजकल सिनेमा हॉल में भी तैयार हो रहा है।
