ये कहानी किसी साधु-संत की नहीं, बल्कि उस परछाईं की है जो धर्म की ओट में अंधेरे की खेती कर रही थी। उत्तर प्रदेश ATS की एफआईआर ने जिस साज़िश से पर्दा उठाया है, वो महज़ कानून तोड़ने की नहीं, बल्कि राष्ट्र की जड़ों को हिलाने की कोशिश है।
एक आलीशान इमारत—जो देखने में धर्मस्थल जैसी लगे, लेकिन उसकी नींव में विदेशी पैसे का ज़हर मिला हो—ऐसा आरोप लगा है जमालुद्दीन उर्फ छांगुर बाबा पर। ATS के मुताबिक़, ये कोई सामान्य आश्रम नहीं था, ये उस सोच की प्रयोगशाला बन रहा था, जहां धर्मांतरण एक कारोबार था और भविष्य में उसे आतंकी कैंप में बदलने की योजना थी।
जिनकी छवि अब तक एक धार्मिक व्यक्ति की थी, उस पर अब आरोप है कि वह एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ा हुआ था, जिसे विदेशी ताकतें फंड कर रही थीं। इमारत बनती गई, लोग जुड़ते गए, और उसके पीछे तैयार हो रही थी एक ऐसी मशीनरी जो देश के खिलाफ खड़ी हो सकती थी।
धर्म के नाम पर जब कारोबार होता है, तब उसका अंत सिर्फ अंधविश्वास तक नहीं होता—वो सामाजिक ताने-बाने को भी तोड़ता है। और जब उस व्यापार में आतंक की बू आए, तब सवाल सिर्फ आस्था का नहीं रहता, तब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा का बन जाता है।
ATS की कार्रवाई केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं है, ये उस पूरे तंत्र के खिलाफ है जो विश्वास की ज़मीन पर अविश्वास का बीज बोता है। धर्म, जो जोड़ने के लिए होता है, उसे अगर किसी ने तोड़ने का औज़ार बनाया है, तो उसे सिर्फ कानून नहीं, समाज भी माफ़ नहीं करेगा।
अब देश देख रहा है कि क्या ये सिर्फ एक छांगुर बाबा की कहानी है या कोई बड़ी साजिश का एक चेहरा? जांच जारी है, और सवाल हवा में तैर रहे हैं—लेकिन एक बात साफ़ है, नकाब उतर चुका है।
अब फैसला कानून करेगा, लेकिन आंखें खुलनी चाहिए समाज की—क्योंकि अगली इमारत कहीं और भी बन रही हो सकती है, और इस बार हमें पहले से होशियार रहना होगा।
