गुजरात के वड़ोदरा ज़िले में मुझपुर-गंभीरा पुल तीन साल से ख़तरे की घंटी बजा रहा था। अगस्त 2022 में वड़ोदरा ज़िला पंचायत सदस्य हर्षदसिंह परमार ने बाकायदा चिट्ठी लिखकर प्रशासन को चेताया था — पुल में असामान्य कंपन महसूस हो रहे हैं, हालत बेहद ख़तरनाक है, निरीक्षण कर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
लेकिन अफ़सोस, ये आवाज़ फाइलों की धूल में दबकर रह गई।
और बुधवार को वही हुआ, जिसका डर था — 43 साल पुराना पुल भरभराकर गिर पड़ा। कम से कम 12 लोगों की ज़िंदगी उसी पुल के साथ मलबे में दफ़न हो गई।
काग़ज़ पर चेतावनी, ज़मीन पर ख़ामोशी
कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। दस्तावेज़ बताते हैं कि ज़िला कलेक्टर के राजस्व अधिकारी ने परमार की चिट्ठी R&B विभाग के कार्यपालक अभियंता को भेजी भी थी। पर जवाब में विभाग ने कहा — “कोई बड़ा नुक़सान नहीं है, बीयरिंग कोट को ठीक कर दिया गया है।”
परमार कहते हैं, “2021 में ही पुल में इतने बड़े गैप आ गए थे कि नीचे बहती नदी दिखाई देने लगी थी। भारी वाहन गुजरते तो पूरा पुल डरावनी तरह से हिलने लगता था।” इसके बाद भी विभाग ने सिर्फ़ सतही मरम्मत कर मामला निपटा लिया।
सवाल जो उठने चाहिए
- जब पुल ‘ख़तरनाक’ घोषित हो चुका था, तो उसे आम लोगों के लिए बंद क्यों नहीं किया गया?
- हर साल करोड़ों के विकास बजट का क्या यही हश्र होना था?
- क्या हमारा सिस्टम केवल हादसों के बाद ही जागता रहेगा?
ये सिर्फ एक पुल की नहीं, सोच की दरार की कहानी है।
📉 सातवीं बार, दोहराई गई ग़लती
2021 से अब तक गुजरात में पुल गिरने की ये सातवीं घटना है।
हर बार जांच कमेटी बनती है, रिपोर्ट आती है, काग़ज़ों में सुधार होता है — पर ज़मीनी सच्चाई वही रहती है: लापरवाही, भ्रष्टाचार और जवाबदेही का अभाव।
पुल गिरना महज़ एक हादसा नहीं है। ये गवाही है उस व्यवस्था की, जो चेतावनी की आवाज़ भी तब तक नहीं सुनती, जब तक मौत दस्तक न दे।
और जब तक यह रवैया नहीं बदलेगा, तब तक पुल गिरेंगे, भरोसा टूटेगा — और हम सब बार-बार मातम मनाते रहेंगे।
