February 9, 2026
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कानपुर से आई यह खबर सिर्फ एक घरेलू झगड़े में हुई हत्या की दास्तान नहीं है, बल्कि यह हमारी पारिवारिक व्यवस्था, बच्चों के मनोविज्ञान और समाज की जिम्मेदारियों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
एक 12वीं के छात्र ने अपनी मां की जान सिर्फ इसलिए ले ली क्योंकि मां ने तेज गाने बजाने से मना किया। घटना को यूं पढ़ना आसान है:
👉 मां ने टोका, बेटा बिफरा, थप्पड़ पड़ा, गुस्से में गला घोंट दिया।
लेकिन क्या हम इसे बस एक आपराधिक वारदात मानकर भूल सकते हैं? या हमें सोचना चाहिए कि ऐसी घटनाओं की जड़ में क्या छिपा है?


मामले की पूरी तस्वीर

कानपुर के रावतपुर थाना क्षेत्र में मंगलवार दोपहर एक 17 वर्षीय छात्र ने अपनी 35 वर्षीय मां की गला घोंटकर हत्या कर दी। वजह? मां ने तेज आवाज में गाने बजाने से रोका, स्पीकर तोड़ा और दो थप्पड़ जड़ दिए। बेटा बेकाबू हो गया और मां की सांसें छीन लीं। फिर शव को दीवान में छिपा दिया।

छोटा भाई जब स्कूल से लौटा तो मां की लाश दीवान में देख चीख पड़ा। आस-पड़ोस वालों की मदद से मां को अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।


असल मुद्दा: गुस्सा, तनाव और बिगड़ता पारिवारिक तानाबाना

क्या कोई मामूली सी कहासुनी इतनी बड़ी त्रासदी में बदल सकती है?
👉 यह मामला एक गुस्से में बेकाबू हुए बच्चे का नहीं, बल्कि समाज में पल रहे मानसिक तनाव, भावनात्मक उपेक्षा और पारिवारिक ताने-बाने की दरारों का आईना है।

एकल माता-पिता का संघर्ष: 35 वर्षीय मां पति की मौत के बाद लंबे समय से दो बेटों की परवरिश कर रही थीं और लिव-इन पार्टनर के साथ रह रही थीं। यह व्यवस्था अपने आप में सामाजिक दबाव और पारिवारिक उलझनों का शिकार रही होगी।

बच्चों की मानसिक स्थिति: किशोरावस्था में बच्चे संवेदनशील होते हैं। सही मार्गदर्शन और भावनात्मक सहारा न मिलने पर वे छोटी बातों पर भी हिंसक हो सकते हैं।

गुस्से पर काबू न होना: बच्चों में गुस्से को संभालने की क्षमता कमजोर पड़ती जा रही है। न माता-पिता के पास समय है, न स्कूलों में चरित्र निर्माण की शिक्षा पर ध्यान है।


क्या यह सिर्फ एक अपराध है?

पुलिस कह रही है कि आरोपी बेटा ‘साइको प्रवृत्ति’ का लगता है। लेकिन क्या हमें इस लेबल से संतोष कर लेना चाहिए?
👉 क्या उसके भीतर का यह गुस्सा समाज ने, घर की स्थितियों ने, उपेक्षा ने और लगातार मानसिक तनाव ने नहीं पाला?
👉 अगर मां-बेटे के बीच संवाद बेहतर होता, अगर घर का माहौल स्वस्थ होता, अगर समाज ऐसे परिवारों को सहारा देता, तो क्या यह हादसा टल सकता था?


समाज को क्या सोचना होगा?

एकल माता-पिता परिवारों को सामाजिक समर्थन की जरूरत है। लिव-इन जैसे संबंधों को लेकर समाज की संकीर्ण सोच इन परिवारों पर और दबाव डालती है।

किशोर मानसिक स्वास्थ्य पर काम जरूरी है। स्कूलों में काउंसलिंग, गुस्सा प्रबंधन, और भावनात्मक बुद्धिमत्ता की ट्रेनिंग समय की जरूरत है।

पड़ोस और रिश्तेदारों की भूमिका जरूरी है। आज परिवार अकेलेपन की दीवारों में कैद हो गए हैं। समाज को देखना होगा कि ये दीवारें टूटें।

स्पीकर की आवाज तो मां ने बंद कर दी, पर उस शोर का क्या जो समाज की चुप्पी में पलता है? वो शोर जो बच्चों को हिंसक बना रहा है, वो शोर जो घरों में संवाद को खत्म कर रहा है। कानपुर की यह घटना कोई पहली नहीं, पर अगर हम अब भी नहीं जागे तो यह आखिरी भी नहीं होगी।

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