
जब भी करबला का नाम लिया जाता है, आंखों के सामने एक वीरान मैदान, तपती रेत और अत्याचार के खिलाफ डटी एक छोटी सी टुकड़ी की तस्वीर उभर आती है। करबला कोई साधारण युद्ध स्थल नहीं था; यह वह धरती है जिसने इस्लाम के मूल उसूलों—न्याय, सच्चाई और इंसाफ—की रक्षा के लिए इतिहास का सबसे बड़ा बलिदान देखा।
680 ईस्वी में करबला की रेत पर इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने अत्याचारी यज़ीद की सत्ता के आगे सिर झुकाने से इनकार कर दिया। उनके पास संख्या, साधन और शक्ति नहीं थी, लेकिन उनके पास वह अदम्य साहस था जिसने इस्लाम को उसकी असली आत्मा से जोड़े रखा। करबला में बहा लहू इस्लाम की वह मिसाल बन गया, जो हर युग में अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है।

आज जब हम करबला को याद करते हैं, तो यह केवल एक शोक नहीं, बल्कि एक जागरूकता का आह्वान है। यह हमें आईना दिखाता है कि धर्म का मतलब सत्ता की चमक-धमक नहीं, बल्कि इंसाफ की राह पर चलना है। करबला हमें सिखाता है कि धर्म सत्ता का मोहरा नहीं बनता, बल्कि अन्याय के विरुद्ध सबसे बड़ा हथियार होता है।
करबला की घटना ने इस्लाम को दो राहों पर बांटा — एक राह जिसने हुसैन के सिद्धांतों को अपनाया और अन्याय से टकराने की हिम्मत दी, और दूसरी राह जिसने सत्ता की भूख में उस पवित्रता को कुचल दिया। शिया मुसलमानों के लिए करबला महज एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि एक जिंदा क्रांति है, जो हर साल मुहर्रम में अशूरा और अरबा’इन पर अपनी बुलंद आवाज में अन्याय के खिलाफ गवाही देती है।
मगर करबला का संदेश सिर्फ शिया समुदाय तक सीमित नहीं। यह इस्लाम के हर मानने वाले के दिल में यह भाव जगाता है कि धर्म वह है जो ज़ुल्म के सामने डट कर खड़ा हो। करबला में दी गई कुर्बानी किसी एक फिरके की नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत की धरोहर है।
आज के दौर में जब धर्म को सत्ता की राजनीति और नफरत फैलाने का साधन बनाया जा रहा है, करबला हमें याद दिलाता है कि सच्चा इस्लाम सत्ता की गोद में बैठने का नाम नहीं, बल्कि हक की लड़ाई का प्रतीक है। करबला का हर कतरा हमें यह सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल हों, धर्म और इंसाफ के उसूलों से समझौता नहीं किया जा सकता।
करबला सिर्फ इतिहास नहीं है, करबला ज़िंदा है, हर उस दिल में जो अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम करबला से सीखें और अपने समाज में सच्चाई, सहिष्णुता और इंसाफ की लौ को बुझने न दें। क्योंकि करबला का संदेश आज भी उतना ही मौलिक और ज़रूरी है: जुल्म चाहे जितना ताकतवर क्यों न हो, सच्चाई की ताकत उससे कहीं बड़ी होती है।