
सुनिए जनाब, देश आज सुपरफास्ट हो गया है। पहले कहा जाता था कि भारत चल पड़ा है, अब कहा जा सकता है कि भारत दौड़ पड़ा है… वो भी 10 मिनट में दूध-चना मंगवाने की रेस में। लेकिन इस रफ्तार ने किसे कुचला है, किसकी रोटियों पर लात मारी है, वो किसी सत्ता के गलियारों या बड़े कारपोरेट बोर्डरूम में चर्चा का विषय नहीं है।
जी हां, बात हो रही है उन छोटे दुकानदारों की… उन किराना दुकानों की, जो किसी ज़माने में आपकी गली का दिल होती थीं, अब धीरे-धीरे क्विक कॉमर्स की क्लिकबाजी की भेंट चढ़ रही हैं।
10 मिनट की डिलीवरी, 50% कम फुटफॉल, और 100% टूटते सपने

किराना दुकानदारों की हालत ये है कि Blinkit और Zepto की बाइक जितनी रफ्तार से सामान पहुंचाती है, उतनी ही रफ्तार से उनकी बिक्री गिर रही है। आंकड़े कह रहे हैं—देश के बड़े शहरों में दुकानों का फुटफॉल 15% से 50% तक गिर चुका है। और यह केवल शुरुआत है जनाब।
क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म ने डिस्काउंट का ऐसा मायाजाल रचा है कि लोग मोहल्ले की दुकान तक जाने को वक्त की बर्बादी मानते हैं। और सरकारें? वो शायद इस दौड़ में जनता की जगह कंपनियों की जीत का जश्न मना रही हैं।
डिस्काउंट का जाल और दुकानदारों की सांसों पर टैक्स
क्विक कॉमर्स के खिलाड़ी (पढ़ें: Amazon, Flipkart, Blinkit) उपभोक्ताओं को बड़े-बड़े डिस्काउंट दे रहे हैं। और ये डिस्काउंट किसी जेब से नहीं, बल्कि छोटे दुकानदारों के हिस्से के मुनाफे से निकलते हैं। FMCG कंपनियाँ भी इन रिटेलर्स पर मार्जिन घटा रही हैं।
सवाल यह है—क्या ये डिस्काउंट सचमुच उपभोक्ता के लिए हैं या सिर्फ आपका डेटा बेचकर आपकी जेब से धीरे-धीरे ज़्यादा पैसे निकलवाने का जरिया हैं?
डाटा का खेल: आपकी पसंद, आपकी जेब, सबको बेचा जाएगा

क्विक कॉमर्स सिर्फ आपका सामान नहीं, आपका डेटा भी जमा करता है। आपके हर ऑर्डर, हर क्लिक, हर लोकेशन पिंग का हिसाब इन कंपनियों के सर्वर पर दर्ज हो रहा है।
फिर होता क्या है?
👉 डायनामिक प्राइसिंग—आपका झुकाव देखकर कीमतें बढ़ा दी जाती हैं।
👉 आपके पसंद की चीज़ों पर ‘टारगेटेड’ ऑफर, ताकि अगली बार आपकी जेब और हल्की हो।
👉 थर्ड पार्टी को डेटा बेचकर अरबों का कारोबार—आपका नाम, आपकी पसंद, आपकी ज़रूरतें।
लेकिन सरकार? सरकार तो डिजिटल इंडिया के नारे में मस्त है, ये देखने की फुर्सत किसे है कि डिजिटल इंडिया के नाम पर कौन आपको बेच रहा है।
छोटे दुकानदारों की बेबसी और बड़े लोगों की बेरुख़ी

किराना दुकानदार तो अब बस अपनी दुकान पर बैठे ग्राहक का इंतजार करते दिखते हैं। जिन गलियों में दुकानदारों की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब क्विक कॉमर्स के डिलीवरी ब्वॉय की बाइक की आवाज है।
कोई नीतिगत योजना नहीं, कोई MSME सहयोग नहीं, कोई टेक्नोलॉजी सब्सिडी नहीं। सरकारें प्रोत्साहित करती हैं स्टार्टअप को—क्योंकि वो ‘यूनिकॉर्न’ बनते हैं, और छोटे दुकानदार? वो आपकी वोटर लिस्ट का हिस्सा होते हैं, बैलेंस शीट का नहीं।
विकसित देशों की सीख, जिनसे हम आँखें मूंदे बैठे हैं
अमेरिका और ब्रिटेन में छोटे रिटेलर्स ने:
✅ Co-op मॉडल अपनाया—साझी टेक्नोलॉजी, साझा सप्लाई चेन।
✅ Click & Collect शुरू किया—ऑनलाइन ऑर्डर, दुकान से पिकअप।
✅ GDPR और CCPA जैसे कानूनों से उपभोक्ता डेटा की हिफाजत की।
हम?
हम तो बस e-commerce giants की गोदी में बैठे तालियाँ बजा रहे हैं।
हकीकत: क्विक कॉमर्स, स्लो डेथ ऑफ ट्रस्ट

हर मोहल्ले की दुकान पर लिखा होता था—“भरोसे का दूसरा नाम”
अब वो भरोसा क्विक कॉमर्स के discount popup में खो गया।
अब ग्राहक नहीं पूछता—“भाईसाहब उधार लिख लो”
अब ऐप पूछता है—“सेव कार्ड डिटेल्स फॉर क्विक पेमेंट?”
अब क्या हो सकता है?
- सरकार को CCI के ज़रिये डेटा दुरुपयोग और प्राइसिंग मैनिपुलेशन पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए।
- MSME टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन स्कीम को किराना स्टोर्स की लॉजिस्टिक्स, ऐप डेवलपमेंट, और ट्रेनींग पर केंद्रित करना चाहिए।
- स्थानीय दुकानदारों के लिए Co-op delivery नेटवर्क बनाया जाए, ताकि वे क्विक कॉमर्स का जवाब दे सकें।
- ग्राहकों को जागरूक करना ज़रूरी है कि सस्ता सामान महंगे डेटा के साथ मिल रहा है।
आखिर में एक सच्चाई
देश की रफ्तार तेज़ हुई है, पर वो रफ्तार किस कीमत पर?
10 मिनट में डिलीवरी चाहिए, पर 10 साल के भरोसे की कब्र खोद कर?
छोटे दुकानदार, जिनकी दुकानें पीढ़ियों से हमारी जरूरतें पूरी कर रही थीं, अब “आउटडेटेड” मानी जा रही हैं।
और हमारे नेता?
वो या तो e-commerce लॉबी की गोदी में हैं या अपनी अगली प्रेस कॉन्फ्रेंस में डिजिटल इंडिया का जश्न मना रहे हैं।
याद रखिए जनाब, देश की आत्मा किराना स्टोर्स की काउंटर पर ही बसती थी, न कि किसी ऐप के डिस्काउंट नोटिफिकेशन में।
आज वो आत्मा खतरे में है… और ये खतरा कोई 10 मिनट की डिलीवरी से नहीं, 10 साल की नीतिगत नाकामी से पैदा हुआ है।
अब जिम्मेदारी आपकी भी है
अगली बार सामान खरीदें तो सोचिएगा—आप क्विक कॉमर्स का ग्राहक बन रहे हैं या अपने मोहल्ले के दुकानदार की उम्मीदों को बचा रहे हैं?