लखनऊ, जिसे तहज़ीब और नफ़ासत का शहर माना जाता है, वहां आम के स्वाद से जुड़ा उत्सव “आम महोत्सव” आखिर क्यों लूट में बदल गया?
यह सवाल सिर्फ प्रशासनिक चूक या भीड़ नियंत्रण तक सीमित नहीं है। यह हमारी सामूहिक मानसिकता, नैतिक शिक्षा और सांस्कृतिक पतन की भी गवाही देता है।
जब स्वाद से ज़्यादा लूट हावी हो गई

“आम महोत्सव” का आयोजन आमतौर पर खेती-किसानी को सम्मान देने और भारत की फल-संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है।
लेकिन जब महोत्सव के अंतिम दिन भीड़ थैले भर-भर कर आम लूटने लगी, पेटियों से फल छीनने लगी, और आयोजक पूरी तरह लाचार हो गए,
तो सवाल यह नहीं रह गया कि कितने आम बर्बाद हुए —
सवाल यह हो गया कि हमारी संस्कृति में आखिर क्या बचा है?
क्या भीड़ बन चुकी है भीषण?
भीड़ को अब सिर्फ एक संख्या नहीं, एक भावना-रहित इकाई समझा जा सकता है।
जिसमें नैतिकता, अनुशासन, और जिम्मेदारी का कोई स्थान नहीं होता।
मुफ्त चीज़ का लालच और व्यवस्था की ढील मिल जाए, तो वही भीड़ लोकतंत्र के मूल्यों को रौंद डालती है।
लखनऊ का महोत्सव इसका जीता-जागता उदाहरण है।
क्या ऐसे आयोजनों का भविष्य खत्म हो रहा है?
ऐसे आयोजन सिर्फ प्रशासन के दम पर नहीं चलते।
ये जनसहभागिता और सामाजिक अनुशासन पर आधारित होते हैं।
लेकिन जब जनता खुद ही व्यवस्था तोड़ने लगे,
जब लोग महज दो किलो आम के लिए धक्का-मुक्की, छीना-झपटी और अराजकता पर उतर आएं,
तो भविष्य में कोई सरकार ऐसे महोत्सवों का आयोजन करने से कतराएगी।
यही नहीं, आम लोग — खासकर महिलाएं, बुज़ुर्ग, और बच्चे —
अब ऐसे आयोजनों में आने से डरेंगे।
क्योंकि उन्हें लगेगा, “भीड़ में कुछ भी हो सकता है”।
मीडिया की भूमिका और समाज की चुप्पी
मीडिया ने घटना को “आम की लूट” जैसी सुर्खियों से खूब चलाया,
लेकिन इस बात पर बहुत कम विमर्श हुआ कि हमारा समाज किस ओर जा रहा है।
लोकतंत्र में मीडिया केवल रिपोर्टिंग नहीं करता, वह दिशा भी देता है।
क्या कोई टीवी डिबेट इस पर चला कि ऐसे आयोजनों में नैतिक शिक्षा को कैसे जोड़ा जाए?
क्या किसी संपादकीय ने पूछा कि “शिक्षा से अधिक, क्या संस्कार सिखाने की ज़रूरत नहीं?”
प्रशासन की ज़िम्मेदारी से इनकार नहीं
यह भी सच है कि आयोजन के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह फेल रही।
यदि आयोजकों ने सीमित प्रवेश, सुरक्षा इंतज़ाम और अनुशासनिक गाइडलाइन बनाई होती,
तो शायद यह घटना टाली जा सकती थी।
पर क्या हर बार सारा दोष प्रशासन पर डालना सही है?
क्या एक समाज को इतना जिम्मेदार नहीं होना चाहिए कि वह सिर्फ नियंत्रित व्यवस्था में ही सभ्य बना रहे?
क्या सभ्यता का मतलब केवल सुरक्षा गार्ड और बैरिकेडिंग के भीतर ही होता है?
समाज की आत्मा का प्रश्न
यह घटना एक संकेत है —
कि हमने सांस्कृतिक आयोजनों को मुफ्त माल मिलने का ज़रिया समझ लिया है।
हम बच्चों को सिखा रहे हैं कि
“धक्का दो, झपटो, ले भागो – यही समझदारी है।”
फिर चाहे वह रेशन लाइन हो, रैली हो, राम कथा हो या आम महोत्सव —
भीड़ हर जगह खुद को नियमों से ऊपर मान रही है।
क्या समाधान है?
- मूल्य-आधारित आयोजनों की आवश्यकता:
कार्यक्रमों में केवल फल और भोज नहीं, सांस्कृतिक शिष्टाचार का भी पाठ पढ़ाया जाए। - जनता में भागीदारी की भावना:
आयोजनों को जनता का महोत्सव बनाने से पहले जनता को भी जवाबदेह बनाना होगा। - स्कूल-कॉलेज से संस्कार की शुरुआत:
नैतिक शिक्षा केवल किताबों में नहीं, जमीनी आयोजन में दी जानी चाहिए। - प्रशासनिक सख्ती:
अनुशासन तोड़ने वालों को नाम-पते सहित पहचान कर, आगामी आयोजनों से वंचित करना चाहिए। - मीडिया विमर्श की दिशा बदले:
खबर के पीछे की सोच पर फोकस हो, न कि सिर्फ “वीडियो वायरल” करने पर।
निष्कर्ष: एक समाज की गिरावट का आईना
“आम महोत्सव” में “आम की लूट” एक दुखद हास्य बन गया है —
जहां हम संस्कृति का उत्सव मनाने आए थे, और तहज़ीब को कुचल कर चले गए।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि
सभ्यता केवल वाणी या कपड़ों से नहीं आती, वह व्यवहार और दृष्टिकोण में होती है।
यदि हम यही करते रहे,
तो भविष्य में “महोत्सव” नहीं होंगे,
सिर्फ “अफसोस” होंगे।
✍️ — यह संपादकीय एक प्रश्न है हम सबके लिए, न कि किसी एक संस्था या सरकार के लिए।
क्योंकि जब आम लूटना आम हो जाए,
तो समझिए — इज़्ज़त, अनुशासन और आत्मा, तीनों फल की तरह सड़ चुके हैं।
