“जब ज़िन्दगी हार मान जाए और मदद की आवाज़ सूनी रह जाए…”
23 जून की रात लखनऊ की रिंग रोड पर एक आवाज़ खामोश हो गई। वो सिर्फ एक युवक की मौत नहीं थी — वो एक चीख थी, जो हम सबने सुनी… लेकिन सुनी-अनसुनी कर दी।
शाहज़ेब शकील, करोड़ों के कर्ज़ में डूबा एक युवा, फेसबुक लाइव पर आया। शायद ये उसकी आखिरी उम्मीद थी — मदद की एक पुकार। उसने सलमान खान से लेकर अंबानी परिवार तक से अपने परिवार के लिए मदद मांगी। वो हारा नहीं था — वो बस अकेला पड़ गया था।
क्या कभी आपने कल्पना की है, कोई अपनी मौत का ट्रेलर खुद शूट करे? वो कैमरे के सामने बैठा हो, कंपकंपाती आवाज़ में दुनिया से सवाल कर रहा हो — “कहीं कोई है?”
और फिर, कैमरे के दूसरी ओर — हम सब। शांत, व्यस्त, या शायद ‘उपेक्षापूर्वक आधुनिक’।
शाहज़ेब की आत्महत्या एक दुखद घटना है — लेकिन उससे भी ज़्यादा ये हमारी चुप्पी और संवेदनहीनता का प्रमाणपत्र है।
❝कर्ज़ केवल रुपये में नहीं होता, कई बार इंसान उम्मीदों का भी कर्ज़दार होता है।❞
हमारा समाज, हमारी विफलताएं
शाहज़ेब जैसे युवाओं के लिए कोई “सुरक्षित निकास द्वार” नहीं बचता। ना परिवार में संवाद, ना समाज में सहारा, और ना सरकार से समर्थन।
फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर — सब जगह “वायरल” है, लेकिन किसी के जीवन की असली तकलीफ को पकड़ने वाली कोई आँख नहीं।
हमें सोचना होगा —
- कैसे एक युवा अपने संघर्ष के अंतिम क्षणों में सिनेमा सितारों और अरबपतियों से आस लगा बैठा?
- क्या हमने आम नागरिकों को इतना अकेला छोड़ दिया है कि वह ‘उम्मीद’ भी अब सिर्फ पोस्टर की शक्ल में बची है?
क्या ये सिर्फ एक आत्महत्या है? या एक सवाल…?
यह घटना हर उस युवा के मन की कहानी है जो दबाव में है, और जिसे लगता है कि “मैं कहीं नहीं जा सकता, कोई नहीं सुनता…”
शाहज़ेब का जाना, हम सबका हार जाना है।
इसलिए अब वक्त है सवाल पूछने का, और जवाब ढूँढने का:
- क्या हम बच्चों को वित्तीय समझ और भावनात्मक सहनशीलता सिखा रहे हैं?
- क्या हमारे मोहल्लों में, स्कूलों में, कॉलेजों में कोई एक व्यक्ति है जो कह सके — “बोलो, क्या हुआ?”
- क्या हमारी सरकारें सिर्फ योजनाएं बना रही हैं या उनके ज़मीन तक पहुँचने की चिंता भी है?
एक मोमबत्ती काफी नहीं है…
शाहज़ेब की मौत के बाद हम सोशल मीडिया पर दुख ज़ाहिर कर देंगे, मोमबत्ती जलाएँगे, #JusticeForShahzeb ट्रेंड कराएँगे।
लेकिन क्या हम एक और शाहज़ेब को रोक पाएँगे?
अगर नहीं — तो हम सब दोषी हैं।
अंतिम शब्द:
हमेशा याद रखिए — मदद माँगना कमजोरी नहीं, साहस होता है। और मदद देना, इंसानियत।
कभी किसी को मदद की ज़रूरत हो — तो सलमान नहीं, आप बनिए उसकी आखिरी उम्मीद।
