लखनऊ की एक शांत कॉलोनी में रविवार की सुबह सूरज कुछ देर से निकला था, लेकिन उस घर के ऊपर पहले ही मौत की परछाई छा चुकी थी। घर का दरवाज़ा बंद था, लेकिन अंदर सब कुछ हमेशा के लिए खत्म हो चुका था — एक व्यापारी, उसकी पत्नी और बेटी की लाशें फर्श पर पड़ी थीं, और दीवार पर टंगी थी एक चिट्ठी, जो बोलने वालों की दुनिया में अब तक पढ़ी नहीं गई।
जिस घर में कभी हँसी गूंजती थी, वहां अब पुलिस के सायरन की आवाज़ और लोगों की कानाफूसी तैर रही थी। जो कभी परिवार था, वह अब केस नंबर बन चुका था, और जो कभी सपने थे, वे अब ‘सुसाइड’ की फाइल में दफन हो चुके थे।
चिट्ठी में लिखा था — “हमें माफ कर देना, अब जीना मुश्किल हो गया है”। यह वाक्य सिर्फ एक दर्द नहीं, बल्कि उस तंत्र पर करारा तमाचा था, जो लोगों को उनके बोझों के साथ अकेला छोड़ देता है।
कर्ज़ का बोझ व्यापारी के कंधों पर इस कदर था कि अब वह सांस लेना भी गुनाह लगने लगा था। बैंक की नोटिसें, ब्याज की दरें, और समाज की खामोशी मिलकर उसे हर दिन अंदर से तोड़ती रही। लेकिन कोई नहीं आया पूछने कि सब ठीक है या नहीं।
व्यापारी की पत्नी, जो हर दिन उसके साथ खड़ी रहती थी, अब खुद भी इस दर्द से थक चुकी थी। बेटी, जिसकी उम्र अभी मुस्कुराने और सपने देखने की थी, वह भी अपने मां-बाप के साथ इस अंधेरे में समा गई।
यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, यह उस व्यवस्था का आईना है, जो खुद को विकासशील कहती है लेकिन अपने नागरिकों को इंसान की जगह नंबर मानती है।
हर रोज़ छोटे व्यापारी, किसान, श्रमिक — कोई न कोई आत्महत्या करता है, लेकिन खबर बनने से पहले ही हम उसे भूल जाते हैं। क्यों? क्योंकि जब तक हमारे घर में सब ठीक है, तब तक दूसरों की तकलीफ हमें परेशान नहीं करती।
सरकार लोन बांटती है, योजनाएं बनाती है, लेकिन वह मन नहीं पढ़ती। वह यह नहीं देखती कि किसके घर में रोटी के साथ डर परोसा जा रहा है।
विपक्ष सवाल उठाता है, लेकिन क्या वह सड़क पर उतरता है? क्या कोई नेता उस घर गया जहां ये सब खत्म हो गया? या फिर ये आवाज़ें सिर्फ चुनावी मंचों तक सीमित रह गई हैं?
अगर आज भी हम चुप हैं, तो याद रखिए — अगली चिट्ठी किसी और की नहीं, हमारी भी हो सकती है।
क्या यह सुसाइड है? या एक सुनियोजित व्यवस्था द्वारा मारे गए तीन मासूम लोग?
अब सवाल यह नहीं है कि कौन जिम्मेदार है, सवाल यह है कि हम कब तक इस तरह के ‘सुसाइड नोट्स’ पढ़कर भी खामोश रहेंगे।
क्या अब भी वक्त नहीं आया कि हम लोकतंत्र के नाम पर चल रही इस व्यवस्थागत हत्या के खिलाफ खड़े हों? क्या अब भी हमारी आंखें नहीं खुलेंगी?Tools
