उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सामने आया यह मामला किसी फिल्मी पटकथा जैसा लग सकता है, लेकिन यह सच्चाई है — और एक ऐसी सच्चाई जो हमारे समाज के उन स्याह कोनों को उजागर करती है, जहां एक महिला की मर्जी, उसकी आज़ादी और उसके फैसले को आज भी ठगा जाता है।
यह घटना महज एक निकाहनामा पर धोखे से साइन करवाने तक सीमित नहीं है। यह उस सोच का प्रतिबिंब है, जहां विवाह जैसे पवित्र रिश्ते को भी छल और साजिश का साधन बना लिया गया है।
कैसे रचा गया यह धोखे का खेल?
चिनहट क्षेत्र की रहने वाली पीड़िता ने जो आरोप लगाए हैं, वे बेहद गंभीर हैं।
👉 रजिस्ट्री के बहाने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए गए।
👉 बाद में पता चला कि वह दस्तावेज कोई प्रॉपर्टी रजिस्ट्री नहीं, बल्कि निकाहनामा था।
👉 विरोध करने पर मानसिक दबाव बनाया गया और निकाह को स्वीकार करने को मजबूर किया गया।
यह सिर्फ धोखाधड़ी नहीं, यह एक महिला की निजता और उसकी सहमति पर हमला है।
सबसे चिंताजनक पहलू: पारिवारिक साजिश
इस पूरे प्रकरण को और भी खतरनाक बनाता है पीड़िता का यह आरोप कि इस साजिश में उसकी अपनी दो बहनों ने भी साथ दिया।
👉 आखिर क्या हालात थे कि एक महिला के खिलाफ उसके अपने ही खून ने साजिश रची?
👉 क्या महिलाओं के अधिकारों को कुचलने में सिर्फ बाहरी लोग नहीं, घर की दीवारें भी साझेदार हो गई हैं?
यह घटना दिखाती है कि जब महिलाओं की मर्जी को ही महत्व न दिया जाए, तो परिवार भी शोषक बन सकता है।
कानून और व्यवस्था पर सवाल
कैसरबाग पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है। जांच हो रही है। लेकिन असली सवाल यह है —
👉 क्या सिर्फ एफआईआर दर्ज हो जाने से पीड़िता को न्याय मिल जाएगा?
👉 ऐसे मामलों में क्यों नहीं तत्काल प्रभावी कानूनी संरक्षण और मनोवैज्ञानिक सहायता दी जाती?
हमारे समाज और कानून व्यवस्था को यह समझना होगा कि जब एक महिला अपनी ही पहचान और अधिकारों के खिलाफ साजिश का शिकार होती है, तो उसे सिर्फ कानूनी नहीं, सामाजिक समर्थन की भी जरूरत होती है।
निकाहनामा या मजबूरीनामा?
विवाह इस्लाम में हो या किसी अन्य धर्म में — यह दोनों पक्षों की खुली सहमति का बंधन होता है।
लेकिन जब निकाह की पवित्रता को इस तरह छल से लांघा जाए, तो यह सिर्फ एक महिला नहीं, पूरे समाज के नैतिक ढांचे पर चोट होती है।
अब जरूरी क्या है?
✅ ऐसे मामलों में फास्ट-ट्रैक कोर्ट में सुनवाई हो।
✅ महिलाओं को मुफ्त कानूनी सलाह और काउंसलिंग दी जाए।
✅ फर्जी निकाह या विवाह के मामलों में सख्त सजा सुनिश्चित की जाए।
✅ परिवारों में महिलाओं की सहमति को लेकर जागरूकता फैलाई जाए।
आज हम 21वीं सदी में होने का दावा करते हैं, लेकिन अगर एक महिला की सहमति को कलम और साजिश की स्याही से मिटाया जा सकता है, तो फिर यह कैसा समाज है?
“कागज़ पर निकाह लिख लिया गया साहब, लेकिन उस औरत की रज़ामंदी अब भी गुमशुदा है। और कानून? वो भी इस निकाहनामे में गवाह ढूंढ़ रहा है।”
