उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज स्थित श्रीराम औद्योगिक अनाथालय से नौ बच्चियों का एक साथ भाग जाना महज़ एक घटना नहीं है। यह उन अनगिनत दरारों को उजागर करता है जो हमारी बाल संरक्षण व्यवस्था में गहराई तक घर कर चुकी हैं। एक ओर हम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे लगाते हैं, वहीं हकीकत यह है कि जिन बेटियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार और समाज पर है, वे ही सबसे ज़्यादा असुरक्षित हैं।
शुक्रवार सुबह जब इन नौ बच्चियों ने अनाथालय की चारदीवारी को नहीं, बल्कि व्यवस्था की दीवारों को फांदकर बाहर निकलने की हिम्मत की, तो यह सवाल खड़ा हुआ — आखिर ऐसा क्या था कि मासूम बच्चियों को अपनी सुरक्षा के लिए खुद भागना पड़ा?
बाल संरक्षण की इमारत में गहरी दरार

अनाथालय से बच्चियों का इस तरह भागना कोई फिल्मी दृश्य नहीं था। यह उस खौफनाक हकीकत का आईना है, जिसमें सरकारी बाल गृह और अनाथालयों की हालत बेहद दयनीय है। कागज़ों पर लाख योजनाएं बनती हैं, निरीक्षण की टीमें दौड़ती हैं, लेकिन इन दीवारों के भीतर क्या गुजरती है, यह शायद किसी को दिखाई नहीं देता।
जब कोई बच्चा या बच्ची अनाथालय की चारदीवारी लांघता है, तो यह सिर्फ दीवार नहीं टूटती, व्यवस्था का भरोसा टूटता है।
क्यों भागीं ये बच्चियां?
पुलिस का कहना है कि ये बच्चियां बाथरूम के रोशनदान की जाली काटकर भागीं। सवाल उठता है — क्या यह कोई एक दिन की योजना थी? क्या अनाथालय की देखरेख इतनी लचर है कि वहां रह रहे बच्चों की मन:स्थिति पर कोई ध्यान नहीं दिया गया?
क्या इन बच्चियों की सुरक्षा, शिक्षा और मानसिक स्थिति का कोई आंकलन किया गया था? या फिर ये अनाथालय भी उन संस्थानों की कतार में है जहां बच्चों के लिए सिर्फ खाना और छत दे देना ही पर्याप्त माना जाता है?
प्रशासन की ताबड़तोड़ कार्रवाई और लीपापोती
डीएम साहब ने आदेश दे दिया — 33 बच्चियों और दो नवजातों को तत्काल दूसरे अनाथालय में शिफ्ट कर दो।
यह कार्रवाई समस्या का समाधान नहीं, बल्कि महज एक लीपापोती है।
बच्चियों को दूसरी जगह भेज देने से उनकी पीड़ा मिट नहीं जाएगी।
जरूरत है एक ईमानदार आत्मनिरीक्षण की —
👉 क्या अनाथालय बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान हैं या वे डर और उपेक्षा के गढ़ बन चुके हैं?
👉 क्या हर निरीक्षण केवल औपचारिकता भर है?
बाल संरक्षण की राजनीति और जमीनी सच्चाई
नेताओं के भाषणों में बच्चियों की सुरक्षा और शिक्षा सबसे बड़े मुद्दे होते हैं। लेकिन इन अनाथालयों में जाकर देखिए — वहां की हकीकत न नारों से बदलती है, न बजट घोषणाओं से।
लखनऊ की घटना हमें याद दिलाती है कि बाल संरक्षण महज़ सरकारी विभागों का काम नहीं है। यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है। अनाथालयों की दीवारों के पीछे की दुनिया को हमें बार-बार देखने और समझने की जरूरत है ताकि ऐसी घटनाओं की नौबत ही न आए।
अब क्या हो?
👉 हर अनाथालय और बाल गृह का स्वतंत्र ऑडिट हो।
👉 बच्चों की मानसिक स्थिति की काउंसलिंग नियमित रूप से हो।
👉 स्थानीय समाज और स्वयंसेवी संगठनों को इन संस्थानों से जोड़ा जाए ताकि बच्चों को केवल देखरेख नहीं, प्यार और सुरक्षा मिल सके।
अगर कोई बच्चा अपनी जान जोखिम में डालकर भाग रहा है, तो यह उस समाज और सरकार की नाकामी का सबसे बड़ा प्रमाण है जो उसे सुरक्षा देने का दावा करता है।
“अनाथालय की दीवारें नहीं टूटीं साहब, हमारी संवेदनशीलता टूट गई है। और सरकार? वो तो शिफ्टिंग आदेश देकर सोच रही है कि जिम्मेदारी पूरी हो गई।”
