February 4, 2026
malihabad

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के मलिहाबाद में बुधवार की सुबह ने दो परिवारों की दुनिया को उजाड़ दिया। तेज रफ्तार ट्रक ने 19 वर्षीय मनीष रावत की साइकिल को रौंद डाला। मनीष की मौत इतनी दर्दनाक थी कि उसका साथी और सबसे करीबी दोस्त सागर गौतम इस सदमे को सह नहीं पाया। उसने रेलवे ट्रैक पर खुदकुशी कर ली।

यह सिर्फ दो युवकों की मौत नहीं थी। यह हमारी लापरवाह परिवहन व्यवस्था, प्रशासन की निष्क्रियता और समाज की उस चुप्पी पर करारा तमाचा था, जो मानसिक स्वास्थ्य को अब भी नजरअंदाज करती है।


तेज रफ्तार ट्रक: मौत की सवारी

सवाल ये है कि आखिर कब तक ये तेज रफ्तार ट्रक हमारे गांव-शहरों की सड़कों पर खुलेआम दौड़ते रहेंगे?
👉 साइकिल से आम तोड़ने जा रहे दो मासूम लड़कों को ट्रक ने कुचल डाला और फिर वही पुरानी प्रक्रिया — पंचनामा, पोस्टमार्टम और फाइल बंद।
👉 क्या कोई बताएगा कि ट्रक ड्राइवर पर क्या कार्रवाई हुई? क्या इन ग्रामीण सड़कों पर कोई स्पीड मॉनिटरिंग है? या ये सड़कें सिर्फ मौत का रास्ता बन चुकी हैं?


दोस्ती, दर्द और मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी

सागर गौतम की मौत उतनी ही बड़ी त्रासदी है जितनी मनीष की। एक दोस्त की मौत के सदमे ने उसे इस कदर तोड़ दिया कि उसने मौत को गले लगा लिया।
👉 लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा कि हमारे समाज में युवा दुख और सदमे से कैसे जूझते हैं?
👉 क्या स्कूलों, गांवों और समुदायों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कोई जागरूकता है?

हमारी शिक्षा, हमारा समाज और हमारी सरकार — सब इस मामले में चुप हैं।


सिस्टम की नाकामी

👉 सड़कों पर रफ्तार पर कोई नियंत्रण नहीं।
👉 युवाओं को मानसिक रूप से मजबूत करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं।
👉 हादसे के बाद वही रटी-रटाई पुलिस की कार्रवाई, पोस्टमार्टम की औपचारिकता और फिर सब सामान्य।

“सड़क पर मौत दौड़ रही है साहब, और सिस्टम आंखें मूंद कर सो रहा है। दो घर उजड़ गए, लेकिन क्या रफ्तार थमेगी? क्या कोई पूछेगा कि हमारे युवा इतना टूट क्यों जाते हैं?”


अब क्या ज़रूरी है?

✅ ग्रामीण और शहरी सड़कों पर ओवरस्पीडिंग पर सख्त नियंत्रण।
✅ ट्रक-बस ड्राइवरों की नियमित जांच और प्रशिक्षण।
✅ स्कूल-कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य पर अनिवार्य काउंसलिंग व्यवस्था।
✅ हादसों के बाद त्वरित मुआवजा और परिवार को सहायता।


एक सवाल सबके लिए

मनीष और सागर की मौत हमें एक बार फिर सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम एक ऐसा समाज बन चुके हैं जहां मौत पर भी दो मिनट की संवेदना के बाद ज़िंदगी सामान्य हो जाती है और सिस्टम फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौट आता है?

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