
लखनऊ की 19 वर्षीय सिमरन राजपूत, जो एमिटी विश्वविद्यालय की छात्रा थी, सपनों से भरी ज़िंदगी जी रही थी। लेकिन 24 जून 2025 को एक ऐसा हादसा हुआ जिसने न सिर्फ एक होनहार बेटी की जान ले ली, बल्कि पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। सिमरन की हत्या किसी और ने नहीं, उसके सौतेले पिता विकास पांडेय ने की।लखनऊ के महानगर थाना क्षेत्र की रहने वाली 19 साल की सिमरन को उसके सौतेले पिता ने ही चाकुओं से गोदकर मार डाला. घटना सोमवार देर शाम की है.
एक माँ की उम्मीदें और एक टूटा हुआ घर

सिमरन के पिता का निधन 2014 में हुआ था। जीवन की नई शुरुआत की उम्मीद में उसकी माँ रेखा ने विकास पांडेय से विवाह किया। मगर यह रिश्ता सिमरन के लिए सहज नहीं था। वह अपने पिता की यादों और नए रिश्ते की उलझनों में उलझी रही। एक घर, जो उसके लिए सुरक्षित स्थान होना चाहिए था, वही उसके लिए डर और असुरक्षा की जगह बनता चला गया।
वो काली रात
घटना वाली शाम सिमरन अपने मोबाइल पर व्यस्त थी। तभी विकास पांडेय ने उस पर अनैतिक बातचीत का झूठा आरोप लगाते हुए अचानक हमला कर दिया। सिमरन की मां रेखा राजपूत ने बताया कि सिमरन मोबाइल में फोटो देख रही थी. मगर उसके सौतेले पिता विकास को शक हुआ कि वह किसी लड़के से बात कर रही है.उसने बेरहमी से चाकू से वार किए और रेखा पर भी हाथ उठाया, जो बेटी को बचाने की कोशिश कर रही थी। सिमरन की सांसें मौके पर ही थम गईं।
एक दर्दनाक अंत, एक नई शुरुआत की पुकार

यह सिर्फ एक हत्या नहीं थी। यह घटना हमारे समाज को आईना दिखाती है — जब बेटियों को अपने ही घर में सुरक्षित महसूस नहीं होता, तब सशक्तिकरण की बातें खोखली लगती हैं।
यह घटना हमें कुछ अहम सवाल करने पर मजबूर करती है:
हम बेटियों को कैसे यह सिखाएं कि अगर घर में ही असमानता या अन्याय हो रहा हो तो वे निडर होकर आवाज उठाएं?
क्या हमारे समाज में ऐसा कोई तंत्र है जो शोक, टूटे रिश्तों और नए परिवारिक समीकरणों को समझ सके और मार्गदर्शन दे सके?
हम कैसे सुनिश्चित करें कि महिलाओं की आवाज संकट के समय सुनी जाए और उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो?
सिमरन की कहानी: नारी सशक्तिकरण की मिसाल बने
सिमरन केवल एक छात्रा नहीं थी, वह उन अनगिनत बेटियों में से थी जो शिक्षा और आत्मनिर्भरता के रास्ते अपने सपने गढ़ रही थीं। इस घटना से यह ज़रूरत सामने आई है:
खुले संवाद की संस्कृति – घर में पारदर्शिता और विश्वास से कई तनावपूर्ण स्थितियों को समय रहते सुलझाया जा सकता है।
संकट सहायता प्रणाली – महिलाओं के लिए काउंसलिंग, हेल्पलाइन और सुरक्षित आश्रय केंद्र सुलभ होने चाहिए।
समुदाय की जागरूकता – पड़ोसी, मित्र और संस्थाएं घरेलू हिंसा या तनाव के संकेतों को पहचानें और हस्तक्षेप करें।
कानूनी सशक्तिकरण – महिलाओं को restraining orders, कानूनी मदद और संरक्षण गृह जैसी सुविधाएं आसानी से मिलनी चाहिए।
सिमरन की याद में
सिमरन की कहानी हमें यह सिखाती है कि नारी सशक्तिकरण सिर्फ नारों से नहीं होगा। हमें घर-घर में बेटियों को सम्मान और सुरक्षा देने की संस्कृति को मजबूती से स्थापित करना होगा। उसकी याद में, हमें प्रण लेना चाहिए कि कोई और सिमरन इस तरह अपने सपनों से हाथ न धो बैठे।