February 9, 2026
devendra fadanvis

Choir India News Network |

क्या महाराष्ट्र आज उस राह पर चल पड़ा है, जहाँ भाषा के नाम पर नफरत, हिंसा और बहिष्कार का माहौल तैयार किया जा रहा है? क्या “मराठी अस्मिता” के नाम पर अब लोकतंत्र और सह-अस्तित्व की बुनियादें दरक रही हैं?

हालिया घटनाओं ने यह सवाल एक बार फिर ज़ोरों से उठाया है — क्या महाराष्ट्र मणिपुर की तरह भाषा और पहचान की लड़ाई में बंट रहा है?


भाषा की रक्षा या भाषायी आतंक?

ठाणे ज़िले के भायंदर इलाके में एक फूड स्टॉल मालिक को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि वह मराठी नहीं बोल पा रहा था।
इसी तरह मुंबई में एक कारोबारी के कार्यालय पर हमले हुए क्योंकि उसने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह मराठी नहीं बोलेगा।

इन दोनों ही मामलों में मनसे कार्यकर्ताओं की भूमिका सामने आई है। इस कट्टरता के बीच, राज्य की सत्ता पर काबिज भाजपा और उसकी सहयोगी सरकार की प्रतिक्रिया बेहद कनफ्यूज़न से भरी, ढुलमुल और अवसरवादी दिखती है।


मुख्यमंत्री की चेतावनी या सहमति?

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जरूर कहा कि “मराठी बोलने की अपील की जा सकती है, ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती।”
पर क्या यही ज़बरदस्ती आज सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक नहीं दिखाई दे रही?

मुख्यमंत्री आगे कहते हैं, “जो कानून हाथ में लेगा, उस पर कार्रवाई होगी” — पर सवाल है: क्या यह कार्रवाई दिख भी रही है? या फिर यह सब केवल बयानबाज़ी बनकर रह गया है?


जय गुजरात बनाम जय महाराष्ट्र: पहचान का संकट या राजनीति की साजिश?

उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का “जय गुजरात” कहना और उस पर मुख्यमंत्री का बचाव करना — यह दिखाता है कि महाराष्ट्र की राजनीति आज पहचान की विडंबनाओं में उलझ चुकी है
जब सत्ता के शीर्ष नेता खुद असमंजस में हों, तो ज़मीन पर रहने वाले आम नागरिकों से सहिष्णुता की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?


भाषा प्रेम बनाम भाषायी कट्टरता

यदि किसी को वाकई मराठी से प्रेम है, तो उसे यह भाषा दूसरों पर थोपने की जगह, अपनाने और सिखाने का प्रयास करना चाहिए।
मुख्यमंत्री खुद कहते हैं: “अगर आपको मराठी पर गर्व है, तो अपने बच्चों को मराठी स्कूलों में भेजिए।”
पर सच यही है कि नेताओं के बच्चे भी मराठी माध्यम के स्कूलों में नहीं जाते — तो आम जनता से क्या अपेक्षा?


महाराष्ट्र: सह-अस्तित्व की ज़मीन या उग्र क्षेत्रीयता का अखाड़ा?

महाराष्ट्र का इतिहास लोकतंत्र, सहिष्णुता और सामाजिक सुधार आंदोलनों से भरा रहा है।
मराठी ने देश को साहित्य, राजनीति, शिक्षा और क्रांति में अग्रणी चेहरे दिए हैं। लेकिन आज वही मराठी भाषा डर, नफ़रत और हिंसा का प्रतीक बनती जा रही है।

क्या हम सच में एक ऐसा महाराष्ट्र बनाना चाहते हैं जहां जो मराठी नहीं बोलता, उसे “दूसरा” या “गैर” मान लिया जाए? क्या यह वही राज्य है जिसे बाबा साहब अम्बेडकर, बाल गंगाधर तिलक और पु. ल. देशपांडे ने गढ़ा था?


निष्कर्ष: भाषा प्रेम से राष्ट्र प्रेम की ओर लौटें

मराठी भाषा हमारी विरासत है, पर कोई हथियार नहीं।
उसे मजबूती से थामना है, पर दूसरों पर मारना नहीं।
महाराष्ट्र को अब यह तय करना है कि वह “मराठी के नाम पर मणिपुर” बनेगा या “सभी भाषाओं का गौरव स्थल” रहेगा।


✍🏻 लेखक — Choir India संपादकीय टीम
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