हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले का माजरा क्षेत्र इन दिनों सुर्खियों में है। 18 वर्षीय युवती के कथित अपहरण की खबर ने जहां पूरे इलाके को झकझोर दिया, वहीं इसके बाद भड़की हिंसा और सियासी रैलियों ने मामले को और उलझा दिया। घटना की जमीनी सच्चाई और उसके इर्द-गिर्द रचे गए सियासी नाटक पर अब सवाल उठने लगे हैं — क्या वास्तव में मामला अपहरण का था, या फिर इसे राजनीतिक रंग देकर कुछ और हासिल करने की कोशिश की जा रही थी?
घटना की शुरुआत: अपहरण या सहमति से भागना?
10 जून को माजरा थाने में लड़की के परिजनों ने शिकायत दर्ज करवाई कि उनकी बेटी का अपहरण कर लिया गया है। पुलिस ने केस दर्ज कर कार्रवाई शुरू की। मगर पुलिस की शुरुआती जांच और बाद में लड़की की बरामदगी के बाद जो बातें सामने आईं, वो इस पूरे हंगामे की बुनियाद को हिला देती हैं।
👉 पुलिस के मुताबिक, यह मामला अपहरण का नहीं बल्कि कथित रूप से युवती के अपनी मर्जी से किसी के साथ भागने का था।
👉 लड़की को बरामद कर लिया गया है और वो सकुशल है।
सड़क पर उतरी सियासत
मामले की गंभीरता से ज्यादा सियासत गर्म हो गई। माजरा और आस-पास के इलाके — किरतपुर, मेलियों, फतेहपुर और मिश्रावाला — में तनाव फैल गया। धारा 163 (BNSS) लागू करनी पड़ी ताकि हालात काबू में रह सकें।
शुक्रवार शाम को विरोध प्रदर्शन हिंसक हो उठा। दो गुटों में टकराव हुआ, पत्थरबाजी हुई और हालात बिगड़ने लगे। प्रदर्शनकारियों का एक गुट आरोपी के घर की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा था, जिसे पुलिस ने रोका। नतीजा — हल्का लाठीचार्ज हुआ और तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए। एक के सिर में गंभीर चोट आई।
बीजेपी की रैली: मुद्दा न्याय या सियासत?
राज्य भाजपा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर समेत कई बड़े नेता मैदान में उतर आए। पांवटा साहिब में आक्रोश रैली निकाली गई। रैली में आरोप लगाए गए कि प्रशासन ने मामले को दबाने की कोशिश की और पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर लाठीचार्ज किया।
डॉ. बिंदल ने कहा,
“स्थानीय समुदाय में गहरा आक्रोश है। प्रशासन ने लड़की की बरामदगी की पुष्टि की है लेकिन अब यह जरूरी है कि पूरी पारदर्शिता के साथ सच जनता के सामने लाया जाए ताकि भरोसा बहाल हो सके।”
उन्होंने पुलिस लाठीचार्ज की निष्पक्ष जांच की भी मांग की।
माजरा कांड पर बड़ा सवाल: कब तक संवेदनशील मामलों पर राजनीति?
असल चिंता यह है कि इस तरह के संवेदनशील मामलों को राजनीति की बिसात क्यों बना दिया जाता है?
👉 लड़की की बरामदगी के बाद भी सड़कों पर प्रदर्शन क्यों?
👉 जब पुलिस जांच जारी थी तो हिंसा और पत्थरबाजी की जरूरत क्यों पड़ी?
👉 क्या इन प्रदर्शनों का मकसद वाकई न्याय पाना था, या फिर राजनीतिक अंक बटोरना?
कहना गलत न होगा कि मामला एक युवती की सुरक्षा से हटकर राजनीतिक दांवपेच का अखाड़ा बन गया।
जनता की अपेक्षा और प्रशासन की जिम्मेदारी
आज जरूरत है कि प्रशासन पूरी पारदर्शिता और संवेदनशीलता से काम करे ताकि जनता का भरोसा कायम रहे। साथ ही राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि संवेदनशील मामलों में धैर्य रखें और जांच पूरी होने तक सड़कों पर सियासी ताकत दिखाने से बचें।
“लड़की बरामद हो गई, मगर सियासत की भूख अब भी जिंदा है। बयानवीरों की आवाज़ें गूंज रही हैं, पत्थर अब जमीन पर नहीं, भाषणों में चलाए जा रहे हैं। और जनता? वो बस यह सोच रही है कि आखिर उसका भला कब होगा?”
अब आगे क्या?
✅ प्रशासन को निष्पक्ष जांच के नतीजे जल्द जनता के सामने रखने चाहिए।
✅ राजनीतिक दलों को जिम्मेदारी दिखानी होगी और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने से बचना होगा।
✅ समाज को ऐसे मामलों पर संवेदनशीलता और धैर्य दोनों रखना होगा।
