उत्तर प्रदेश के बागपत से आई मनीषा की आत्महत्या की खबर कोई आम घटना नहीं है। यह वह चीख है, जिसे न सुना गया, न समझा गया—और जब तक समाज ने कान खोले, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
28 वर्षीय मनीषा ने अपनी जान लेने से पहले कोई कागज़ नहीं ढूंढा। उसने अपना दर्द अपनी ही त्वचा पर लिख दिया—हाथों पर, पैरों पर, पेट पर। एक-एक शब्द, जैसे किसी जलते अंगारे पर उकेरे गए हों। उसकी देह अब एक दस्तावेज़ बन गई है—जिस पर लिखा है कि “कुंदन और उसका परिवार मेरी मौत के जिम्मेदार हैं।”
क्या ये हमारी संवेदना के लिए पर्याप्त नहीं कि एक महिला ने अपना अंतिम पत्र किसी डायरी में नहीं, अपने जिस्म पर लिखा?
मनीषा की कहानी किसी एक घर की कहानी नहीं है—ये उस पूरे सामाजिक ढांचे की पोल खोलती है, जहां आज भी दहेज नाम की बीमारी ज़िंदा है, और औरत की आवाज़, उसकी जान से भी सस्ती समझी जाती है।
20 लाख रुपये की शादी, एक बुलेट मोटरसाइकिल देने के बावजूद भी मांगें खत्म नहीं हुईं। कार चाहिए, और पैसा भी। नहीं मिली तो गालियां, मारपीट, जबरन गर्भपात और आखिरकार, ज़हर।
विडंबना देखिए—मनीषा ने एक वीडियो भी बनाया था, जिसमें रोते हुए उसने अपने ससुराल वालों को दोषी ठहराया। लेकिन यह वीडियो अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ ही देखा जा रहा है—जब कुछ कर सकने की कोई गुंजाइश नहीं बची।
2023 में शादी हुई थी, और 2024 में मौत। शादी के चंद महीनों में ही प्रताड़ना का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि आखिरकार एक लड़की ने जीने की बजाय मरने का रास्ता चुन लिया।
उसने जुलाई 2024 में मायके आकर कुछ राहत लेने की कोशिश की थी। लेकिन चार दिन पहले जब परिवार वालों ने तलाक की बात छेड़ी, तो मनीषा ने कहा कि जब तक दहेज का सामान वापस नहीं मिलेगा, वो तलाक के कागज़ों पर दस्तखत नहीं करेगी। ये आत्मसम्मान की आखिरी जिद थी, और शायद अंतिम संवाद भी।
अब सवाल यह नहीं है कि दोषी कौन हैं। सवाल यह है कि हर बार मरने वाली ही औरत क्यों होती है? क्यों हमें किसी के मरने के बाद ही पता चलता है कि वह ज़िंदा रहते हुए कितना कुछ सह रही थी?
हमारे देश में दहेज के खिलाफ कानून है, लेकिन ज़मीर नहीं। पुलिस रिपोर्ट दर्ज कर लेती है, लेकिन समाज की याददाश्त कमज़ोर होती है। जब तक कोई मनीषा मर नहीं जाती, तब तक वह सिर्फ एक “बहू” होती है, इंसान नहीं।
समाज को सोचना होगा—क्या हम इतनी बार एक जैसी खबरों को पढ़ते-पढ़ते सुन्न हो गए हैं? क्या एक और मनीषा को अपनी चमड़ी पर लिखकर ये साबित करना पड़ेगा कि वो वाकई प्रताड़ित थी?
इस बार केवल न्याय की मांग नहीं होनी चाहिए। इस बार मनीषा की चीख को पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए, सभाओं में दोहराया जाना चाहिए, और समाज की दीवारों पर लिखा जाना चाहिए—क्योंकि जब एक महिला की आत्मा खुद को गवाही में बदल दे, तो ये सिर्फ मामला नहीं, इंसानियत का इम्तिहान होता है।
