यह घटना केवल एक बच्चे पर हमला नहीं है — यह हमारे समय की उस क्रूरता और अमानवीयता का आईना है, जिसमें इंसानियत दम तोड़ती दिख रही है। मास्को एयरपोर्ट पर एक ईरानी बच्चे पर बेलारूस के एक यहूदी यात्री द्वारा किया गया यह बर्बर हमला केवल एक व्यक्ति की दरिंदगी नहीं है, बल्कि एक ऐसी मानसिकता का नतीजा है जो युद्ध, नफ़रत और संकीर्णता की कोख से जन्म लेती है।
एक ऐसा मासूम, जो अपने वतन से विस्थापित होकर शरण की तलाश में था, जिसकी मासूम आंखों में शायद अभी भी अपने उजड़े घर की तस्वीरें तैर रही होंगी — उस पर हाथ उठाना केवल कायरता नहीं, यह सभ्यता पर धब्बा है। यह वही दुनिया है जहाँ हम बड़ी-बड़ी अंतरराष्ट्रीय बैठकों में शांति और मानवाधिकारों की दुहाई देते हैं, लेकिन जमीन पर नफ़रत की चिंगारियाँ बच्चों को लहूलुहान कर रही हैं।
वह ईरानी बच्चा आज कोमा में है, गंभीर चोटों से जूझ रहा है। सोचिए, क्या उसका गुनाह यह था कि वह उस देश से आया है जो युद्ध की आग में झुलस रहा है? क्या उसका अपराध यह था कि वह अपने माता-पिता के साथ सुरक्षित ज़मीन की तलाश में था? यह घटना हमें याद दिलाती है कि युद्ध केवल मोर्चों पर नहीं लड़े जाते; उनके ज़हर से इंसानी रिश्ते, इंसानी संवेदनाएं और हमारी पूरी सभ्यता धीरे-धीरे सड़ती जाती है।
यह हमला एक असहाय बच्चे पर नहीं, हमारी इंसानियत पर हमला है। और अफसोस इस बात का है कि दुनिया तमाशबीन बनी रहती है। नफ़रत के इस बाज़ार में यह हमला शायद एक और संख्या बनकर रह जाएगा, लेकिन एक पत्रकार और एक इंसान के तौर पर हमें इस बर्बरता को उजागर करना होगा, इसकी निंदा करनी होगी।
आज ज़रूरत है कि हम युद्ध और हिंसा की राजनीति को बेनकाब करें। जो लोग नफ़रत की जमीन पर अपनी सत्ता की इमारत खड़ी कर रहे हैं, उनसे सवाल पूछें। क्योंकि अगर हम आज नहीं बोले, तो कल ये ज़हर हर गली, हर देश, हर इंसान की रगों में दौड़ेगा।
यह समय है, जब हमें न केवल इस घटना की कड़ी निंदा करनी चाहिए बल्कि उस सोच को भी चुनौती देनी चाहिए जो मासूम बच्चों पर हमला करने को किसी भी तरह से जायज़ ठहराती है।
