उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की एक सड़क पर कुछ सेकंड के लिए बाइक टच क्या हुई — इंसानियत जैसे रिवाज़ के जुलूस में दबकर दम तोड़ गई।
कांवड़ियों के गुस्से की आग इतनी तेज़ निकली कि उन्होंने पहले तो उस युवक को लाठी-डंडों से पीटा, फिर सड़क पर गिराकर उसकी बाइक को तोड़ना शुरू कर दिया।
वो युवक, जो खुद को बचाने के लिए सिर्फ एक हेलमेट का सहारा लिए खड़ा था — उस हेलमेट पर बजती डंडों की आवाज़ जैसे बता रही थी कि भीड़ का गुस्सा तर्क और इंसाफ़ से बड़ा हो चुका है।
पुलिस बीच में आई — बाइक को किसी तरह बचाया। लेकिन गुस्से के नशे में डूबे कांवड़ियों की लाठियाँ फिर भी चलती रहीं, मानो उनका संदेश साफ़ था: “हम भगवान के नाम पर निकले हैं, अब हमें रोकने का हक किसी को नहीं है।”
पर सवाल ये है:
क्या आस्था इतनी नाज़ुक हो गई है कि बाइक छू जाने भर से टूट जाती है?
या भीड़ की ताक़त ने हमें ये यक़ीन दिला दिया है कि सड़कों पर कानून का नहीं, हमारे गुस्से का राज चलेगा?
जिस धर्म को सहिष्णुता सिखाने के लिए जाना जाता है, उसी के नाम पर ऐसा उन्माद — ये मज़हब की तौहीन नहीं तो और क्या है?
हमारे लिए आईना:
ये घटना अकेली नहीं है। कांवड़ यात्रा का सीज़न आते ही बार-बार खबरों में सड़कें बंद होती हैं, दुकानों पर तोड़फोड़ होती है, हॉस्पिटल तक पहुँचने के रास्ते जाम हो जाते हैं।
मगर प्रशासन डरता है — और समाज खामोश रहता है।
धर्म के नाम पर कानून से ऊपर खड़े हो जाना, और फिर ये सोचना कि भगवान भी हमारी इस ज़िद का समर्थन करेंगे — इससे बड़ा भ्रम शायद ही कोई हो।
गुस्से में उठी लाठी चाहे किसी भगवे झंडे के नीचे हो, या हरी टोपी के, या किसी और रंग के — उस लाठी का रंग हमेशा काला ही होता है।
