February 9, 2026
Beautiful silhouette of a mosque against a vibrant sunset sky, highlighting its architectural elegance.

उस घर में सिर्फ नमाज़ नहीं होती थी… उम्मीदें भी सजती थीं

वो घर बहुत बड़ा नहीं था।
तीन कमरों का एक छोटा-सा मकान, एक हॉल — बस उतनी ही जगह थी। लेकिन उस हॉल में हर दिन कुछ बड़ा होता था।
वहां इबादत होती थी… राहत मिलती थी… जुड़ाव होता था।

बरेली के भोजीपुरा गांव के उस घर में लोग चालीस साल से नमाज़ पढ़ते आ रहे थे।
ना कोई लाउडस्पीकर था, ना भीड़, ना कोई प्रदर्शन।
बस कुछ बुज़ुर्ग, कुछ बच्चे, कुछ मेहनतकश लोग —
जो अपनी रोटी-कपड़े के बीच खुदा से थोड़ी बात कर लेने आते थे।


1985 से 2024 तक… और एक दिन सब कुछ बदल गया

जमील अहमद के पिता ने 1985 में वह हॉल अल्लाह के नाम कर दिया था।
2018 में उन्होंने जिला प्रशासन से इसकी इजाज़त भी ली थी।
गांव में कोई मस्जिद नहीं थी — यह जगह ही लोगों की उम्मीद बन गई थी।

लेकिन एक सुबह पुलिस आई।
बोलने वालों को थाने ले गई।
और शाम तक, उस दरवाज़े पर ताला जड़ दिया गया — जैसे सिर्फ एक कमरा नहीं, उनकी रूह बंद कर दी गई हो।


ईद से पहले की वह काली सुबह

5 जून को पुलिस ने तीन लोगों को थाने बुलाया —
नूर अहमद, असगर अहमद, और जमील
उनसे कहा गया — “आप गैरकानूनी नमाज़ पढ़ रहे हैं।”

उन्होंने दस्तावेज़ दिखाए, बोले — “हम तो वर्षों से यही करते आ रहे हैं।”
लेकिन सुनवाई नहीं हुई।
उन्हें थाने के लॉकअप में डाला गया।
और अगले दिन, उस घर को सील कर दिया गया।


गांव की बुज़ुर्ग महिलाओं की आंखों में वो सवाल था…

“हम कहां जाएंगे अब?”
“क्या इबादत भी अब गुनाह बन गई है?”

गांव के 500 मुस्लिम परिवार, बुज़ुर्ग महिलाएं जो रोज़ उसी घर में दुआ मांगती थीं —
अब चुप थीं।
किसी ने रोते हुए कहा — “हमने तो मंदिरों के सामने से हमेशा सर झुकाकर गुज़ारा है… किसी का दिल नहीं दुखाया, फिर आज ये सज़ा क्यों?”


गांव का प्रधान भी हैरान है

गांव के प्रधान मुनीश गंगवार ने कहा —
“यहां तो कोई विवाद नहीं था, सब कुछ शांति से चल रहा था। अब अचानक क्या हो गया?”

सवाल वही है — विवाद पैदा किया गया या ढूंढा गया?

क्योंकि अब गांव की “शांति” में अल्पसंख्यकों की प्रार्थना भी खलल मानी जाती है।
और जो खलल नहीं भी है — उसे बनाना ज़रूरी हो गया है।


गुंडाराज की नई परिभाषा

कभी गुंडाराज का मतलब होता था — लाठी, बंदूक और धमकी।
अब गुंडाराज कानून की पोशाक पहन चुका है।
अब दस्तावेज़ होने के बावजूद इबादत गैरकानूनी है।
अब “शांति भंग” की परिभाषा है — मुसलमानों का इकट्ठा होना।


उस घर में अल्लाह से ज़्यादा भरोसा था… इंसानियत पर

अब वो घर बंद है।
वो दरवाज़ा, जो उम्मीद का था — अब सत्ता की मुहर से बंद है।

लेकिन सच तो यह है —
आप किसी कमरे को बंद कर सकते हैं, किसी आवाज़ को नहीं।
इबादत पर ताले ज़रूर लगे हैं,
लेकिन ज़ुल्म को देखकर जो आंसू निकले हैं —
वो अब सवाल बनकर बहेंगे।


ये कहानी एक घर की नहीं है… ये कहानी है उस भारत की, जहां इबादत करने से पहले लोग अब डरने लगे हैं।
और यही डर — लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार है।

क्योंकि जब नमाज़ बंद की जाती है, तो इंसानियत की आरती भी बुझ जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *