नोएडा की निकी भाटी का क़त्ल सिर्फ़ एक घरेलू घटना नहीं है, बल्कि उस समाज का आईना है जहाँ औरत की ज़िंदगी आज भी “दहेज़” जैसे बेजान रिवाज़ों के आगे सस्ती मानी जाती है।
निकी कौन थी?
निकी एक ज़िंदादिल और आत्मनिर्भर बनने का ख़्वाब रखने वाली औरत थी। वह सोशल मीडिया और ब्यूटी पार्लर के काम के ज़रिए अपना करियर बनाना चाहती थी। शादी के शुरुआती दिनों में उसने और उसकी बहन ने पार्लर खोला भी था, लेकिन धीरे-धीरे पति और ससुराल वालों की रोक-टोक और अत्याचार ने उसकी उम्मीदों को कुचलना शुरू कर दिया।
शादी और दहेज़ का खेल

2016 में निकी और उसकी बहन कंचन की शादी एक ही घर के दो भाइयों से हुई थी। शादी के वक़्त पिता ने अपनी हैसियत से ज़्यादा दहेज़ दिया—सोना, चांदी, गाड़ी, स्कॉर्पियो और नक़द रुपये तक। लेकिन लोभ की कोई सीमा नहीं होती। शादी के बाद निकी पर लगातार और पैसे लाने का दबाव बनाया जाने लगा। बताया जाता है कि उसके पति की माँग ₹36 लाख रुपये तक पहुँच गई थी।
अत्याचार और आख़िरी रात

21 अगस्त की रात निकी पर ज़ुल्म की हद पार हो गई। गवाही देने वालों का कहना है कि पहले उसे बालों से घसीट कर पीटा गया, फिर मिट्टी का तेल डालकर ज़िंदा जला दिया गया। यह सब उस वक़्त हुआ जब उसका पाँच साल का मासूम बेटा वहीं मौजूद था। सोचिए, एक बच्चा अपनी माँ को जलते हुए देखे और कुछ कर भी न पाए—ये उसकी ज़िंदगी पर हमेशा के लिए कैसा ज़ख्म छोड़ देगा।
पति का बेहयाई भरा बयान
गिरफ़्तारी के बाद आरोपी पति ने पुलिस के सामने कहा, “मुझे कोई पछतावा नहीं है, पति-पत्नी के झगड़े होते रहते हैं।” यह बयान सुनकर रूह काँप जाती है। क्या पति-पत्नी का झगड़ा किसी औरत को ज़िंदा जला देने का बहाना बन सकता है? यह बयान सिर्फ़ एक आदमी का नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जहाँ औरत को अब भी “मालिकियत” समझा जाता है।
परिवार का दर्द और ग़ुस्सा
निकी के पिता और बहनें न्याय की गुहार लगा रहे हैं। उनका कहना है कि दोषियों को सिर्फ़ सज़ा ही नहीं, बल्कि ऐसा उदाहरण बनाया जाए जिससे कोई और बेटी इस हालात का शिकार न हो। निकी के पिता ने तो साफ़ कहा—“ये लोग क़साई हैं, ज़िंदा रहने के लायक नहीं।”
पुलिस की कार्रवाई
पुलिस ने आरोपी पति और सास को गिरफ़्तार कर लिया है, बाक़ी रिश्तेदारों पर भी कार्रवाई जारी है। मामले की तफ़्तीश में सामने आया है कि यह परिवार पिछले कई सालों से निकी और उसकी बहन को तंग करता आ रहा था। लेकिन जैसे अक्सर होता है—आवाज़ उठाने के बावजूद समाज और क़ानून की सख़्ती देर से पहुँची।
बड़ा सवाल
आज भारत खुद को “नया भारत”, “डिजिटल इंडिया”, “महिला सशक्तिकरण” का झंडाबरदार कहता है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि दहेज़ जैसी बर्बर प्रथा अब भी ज़िंदा है। हर साल हज़ारों औरतें इसी आग में जल जाती हैं। रिपोर्ट दर्ज होती हैं, मामले चलते हैं, लेकिन असली बदलाव कहाँ है?
अगर आज़ादी का मतलब सिर्फ़ झंडा फहराना और भाषण देना है, तो हक़ीक़त यह है कि हम अब भी ग़ुलाम हैं—उन सोचों और उन रिवाज़ों के जो बेटियों को सिर्फ़ “बोझ” समझते हैं।
निकी भाटी की मौत हमें फिर से याद दिलाती है कि जब तक दहेज़ जैसी प्रथाओं को ख़त्म करने के लिए समाज और क़ानून मिलकर सख़्त कदम नहीं उठाएंगे, तब तक “आजाद भारत” का दावा अधूरा ही रहेगा।
