
ओडिशा के बलासोर ज़िले से आई ताज़ा घटना फिर एक बार महिलाओं की सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया की कमजोरियों पर गहरे सवाल खड़े करती है। पुलिस के अनुसार, 23 वर्षीय युवती को उसी के इलाके के एक व्यक्ति ने अपहरण कर लिया और पिछले छह महीनों तक मयूरभंज ज़िले के बारिपदा में कैद कर रखा। इस दौरान पीड़िता के साथ सामूहिक दुष्कर्म और शारीरिक प्रताड़ना की गई।
हाल ही में किसी तरह वह आरोपी के चंगुल से निकल पाई और भोगराई थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने उसके बयान के बाद मेडिकल जांच करवाई और उसे एक पुनर्वास केंद्र भेज दिया।
दिलचस्प यह है कि मार्च में पीड़िता की माँ ने ही पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी एक युवक के साथ घर से भाग गई है और अपने साथ तीन लाख रुपये से अधिक के आभूषण भी ले गई है। उस समय मामला अपहरण का नहीं, बल्कि “घर से भागने” का माना गया और केस उसी आधार पर दर्ज हुआ। सवाल यह है कि क्या यही शुरुआती दृष्टिकोण पुलिस की लापरवाही का संकेत था, जिसने पीड़िता की पीड़ा को लंबा कर दिया?
संस्थागत प्रतिक्रिया और खामियां
पुलिस का कहना है कि आरोपियों को पकड़ने के प्रयास जारी हैं। लेकिन यह बयान अपने आप में अधूरा है। छह महीने तक एक महिला कैद रही, शोषण झेलती रही और कानून-व्यवस्था तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगी। यह केवल अपराधियों की दरिंदगी की कहानी नहीं है, बल्कि राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और सामाजिक तंत्र की असफलता की भी दास्तान है।
व्यापक संदर्भ
इस तरह की घटनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि महिला सुरक्षा केवल कानूनी प्रावधानों या सख्त सज़ाओं से सुनिश्चित नहीं होगी। अपहरण, शारीरिक हिंसा और सामूहिक दुष्कर्म जैसी घटनाएँ यह दिखाती हैं कि समाज और प्रशासन की सक्रिय भागीदारी के बिना बदलाव संभव नहीं है।
सवाल यह भी है कि पीड़िता के परिवार की शुरुआती शिकायत को पुलिस ने क्यों सतही तौर पर लिया? क्या अगर उस समय गहन जांच होती तो स्थिति इतनी भयावह रूप नहीं लेती?
बलासोर की यह घटना न केवल अपराधियों के लिए बल्कि पूरे न्यायिक और प्रशासनिक ढांचे के लिए एक कड़ी परीक्षा है। पीड़िता की बहादुरी—जो उसने कैद से भागकर और शिकायत दर्ज कराकर दिखाई—समाज और कानून दोनों के लिए चेतावनी है कि अब ढिलाई की कोई गुंजाइश नहीं है।