February 9, 2026
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भोपाल की रियासत, दिल्ली की राजनीति और कोर्ट की चौखट — सैफ अली खान के नवाबी ख्वाबों को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने झटका दे दिया है। 15,000 करोड़ की शाही संपत्ति पर 25 साल से चला आ रहा केस अब फिर से खुलेगा, और इस बार ट्रायल कोर्ट को आदेश मिला है कि एक साल में फैसला सुनाओ।

सवाल सिर्फ संपत्ति का नहीं है, सवाल है — क्या वाकई आज़ाद भारत में नवाबी विरासतें राजनीतिक छांव में पनप सकती हैं?




शाही ख्वाब, लोकतांत्रिक ठोकरें

सैफ अली खान, उनकी मां शर्मिला टैगोर और बहन सोहा अली खान को अब फिर कोर्ट की चौखट पर हाजिरी देनी होगी। भोपाल रियासत के आख़िरी नवाब हमीदुल्लाह खान की अरबों की संपत्ति पर अब न केवल परिवार के बाकी वारिस दावा कर रहे हैं, बल्कि सरकार की भी नज़र इस ‘गोल्डन ज़मीन’ पर है।

फ्लैग स्टाफ हाउस से लेकर नूर-उस-सबा पैलेस तक — हर इंच पर कानूनी और राजनीतिक कब्जे की गूंज है।




“नवाब नहीं, अब संविधान बोलेगा” — कोर्ट का रुख साफ

हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि पुराने जमाने की शाही सोच अब नहीं चलेगी। 2000 में ट्रायल कोर्ट ने जो फैसला दिया था, वो सिर्फ इलाहाबाद हाईकोर्ट के पुराने आदेश के आधार पर दिया गया था — जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही ‘भोपाल सिंहासन उत्तराधिकार अधिनियम’ को रद्द कर चुका है। अब फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर होगा — मतलब, नवाबों के किस्सों से ज्यादा वजन अब दस्तावेज़ और वसीयतों का होगा।




‘एनिमी प्रॉपर्टी एक्ट’ का साया — क्या सरकार भी बनेगी दावेदार?

संपत्ति विवाद में अब एनिमी प्रॉपर्टी एक्ट की भी एंट्री हो गई है। यह वही कानून है, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान गए लोगों की संपत्ति को भारत सरकार की मिल्कियत बना देता है। चौंकाने वाली बात ये है कि कोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि सैफ की परदादी साजिदा बेगम को जो संपत्ति मिली थी, वो अब शक के घेरे में है।

अब क्या भारत सरकार भी इस शाही विरासत की दावेदार बनेगी? क्या नवाबी संपत्ति अब राष्ट्र संपत्ति घोषित होगी?




नेताओं की चुप्पी, लेकिन सियासत गर्म

इस मामले ने कानूनी गलियारों के साथ-साथ राजनीतिक गलियारों में भी खलबली मचा दी है। भाजपा शासित मध्य प्रदेश में सरकार के पास अब मौका है — या तो संपत्ति सरकार के अधीन ले आए, या फिर सैफ और उनके परिवार को जन भावना के विरुद्ध शाही ट्रीटमेंट देता रहे।

अब देखना यह है कि कांग्रेस इस मामले पर क्या रुख लेती है — क्योंकि गांधी परिवार से लेकर पटौदी खानदान तक, पुरानी विरासतों की राजनीति में नई गर्माहट आ गई है।




अदालत से सड़कों तक जाएगा मामला?

कानून कह रहा है — अब असली हकदारों की पहचान होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह भी है कि जब हिंदुस्तान के किसान ज़मीन के लिए रोते हैं, तो क्या 15,000 करोड़ की शाही ज़मीन पर चुप रहना इंसाफ है?

अब देखना है कि क्या यह कानूनी लड़ाई किसी राजनीतिक आंदोलन की शक्ल लेगी, या फिर चुपचाप अदालत के कमरे में इतिहास एक बार फिर लिखा जाएगा।




तो अब न शाही खून चलेगा, न सिनेमा का ग्लैमर — फैसले की बुनियाद होगी संविधान, कानून और जनहित।

भारत बदल चुका है, अब सवाल साफ है — नवाबी विरासतों की जगह नई सोच को मिलेगी या नहीं?

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