1. घटना – एक औद्योगिक हृदयघात
तेलंगाना के हृदयस्थल पासिमायलारम में स्थित सिगाची इंडस्ट्रीज की ड्रायर यूनिट में सोमवार सुबह जोरदार विस्फोट हुआ। 8 से 9 बजे के बीच, 140 से ज़्यादा कर्मचारी काम कर रहे थे कि स्तब्ध कर देने वाली आवाज़ के साथ तीन मंज़िला प्लांट धराशायी हो गया ।
35 से 45 तक की आंकड़ें बताई जा रही हैं — मारे गए लोग, जिनमें कई अब भी मलबे में दबी हुई खबरों की आवाज़ सुनाए दे रही हैं ।
2. बुरे रिकॉर्ड का नया अध्याय
यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं—यह तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का सबसे भीषण औद्योगिक हादसा है, जो पिछले पांच वर्षों में कई एक्सप्लोसनों की श्रृंखला में सबसे गंभीर रहा ।
- अगस्त 2024 में अटीचतुपुरम, आंध्र प्रदेश में फ़ार्मा विस्फोट — 17 की मौत, 35 घायल।
- अप्रैल 2024 में सिंगारेद्दी, तेलंगाना में एसबी ऑर्गेनिक्स में गर्म तेल से धमाका — 4 की मौत, 16 घायल ।
3. गहराई में कारण – सिर्फ़ दुर्घटनाएँ नहीं, लापरवाही
CSIR के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक के. बाबू राव कहते हैं कि इन सभी घटनाओं की एक ही वजह है: खराब रख‑रखाव, अनपढ़ कर्मी, सुरक्षा नियमों का अभाव । हर बार FIR दर्ज होती है, मुआवज़ा दिया जाता है, जांच होती है — लेकिन जड़ उखाड़ी नहीं जाती।
निर्दोषों की जान चले जाने पर चुप्पी से दिखता कोई डर नहीं, लेकिन बदलाव की कोई तैयारी भी नहीं।
4. सिस्टम क्यों फेल हुआ?
- 2023 में योजना बनी थी एक संयुक्त निरीक्षण समिति बनाने की—जिसमें फैक्ट्री इंस्पेक्टर, प्रदूषण बोर्ड, अन्य विभाग शामिल होते—लेकिन सदस्य सचिव हटाने के साथ वह योजना भी फाइलों में खो गई ।
- 1990 के दशक से पर्यावरणविद् यहाँ हर हादसे पर चेतावनी दे रहे थे, लेकिन कार्रवाई नहीं, सिर्फ़ शब्दों की ही दीवार बनी ।
5. मानवीय लागत — कौन भुगत रहा है इसका अंजाम?
- ज्यादातर घायल और मृत मायग्रेंट श्रमिक हैं — बिहार, यूपी, ओडिशा, झारखंड। उन्हें जीवन की नई शुरुआत करने के लिए गाँव से अलग काम मिला था, लेकिन लौटते समय उन्हें मलबों में दफ़न होना पड़ा ।
- ये सिर्फ़ आंकड़े में शुमार नहीं—ये वो व्यक्ति हैं जो परिवार की उम्मीदें, भविष्य की कहानियाँ लेकर काम करने आए थे।
6. क्या यह आख़िरी खबर बनी रहेगी?
हर धमाके के बाद राजनीति जुलूस निकालती है, लेकिन क्या उसने गाँवों में जागरूकता फैलाई? क्या त्वरित सुरक्षा संबंधित उपाय लागू किए गए? जवाब है — नहीं।
गाँव वाले, मजदूर, गरीब — क्या उन्हें किसी ने समझाया कि और कितने ब्लास्ट होंगे? तब तक इंतज़ार करेंगे?
7. क्या कभी व्यवस्था जागेगी?
- कानूनों में लिखी है फैक्ट्रीज़ एक्ट और खतरनाक रसायनों के नियम, लेकिन किसी ने पूछा भी नहीं कि क्या हैं आकस्मिक राहत योजनाएँ, ड्रिल, कर्मचारी प्रशिक्षण?
- फायर ऑडिटर सी. एंड्रयू बताते हैं कि “नई फायर एंट्री सिस्टम्स, ड्रिल्स और कम्पार्टमेंटलाइज़ेशन” बहुत पहले लागू हो सकता था—लेकिन अब बचे लोगों से पूछा जाएगा ‘क्या बचाव पर्याप्त है?’ ।
8. संक्षेप में: एक राष्ट्रीय शर्मिंदगी
यह सिर्फ तेलंगाना की शर्मिंदगी नहीं—यह एक देश की शर्मिंदगी है, जहाँ आर्थिक विकास के नाम पर मानव जीवन तिलक माना जाता है। आखिर कब तक गरीब श्रमिकों का जीवन कागज़ों में ‘कमजोर’ श्रेणी, और कार्ड में सिर्फ़ भटकता दर्ज रहेगा?
समाधान की पहल: अब भी दरवाज़े हैं
- यह समय तत्काल संयुक्त समिति की स्थापना का—ज़ेनके तमाम विभागों को एक सतर्क कार्रवाई मॉडल सहित चाहिए।
- टूटी योजनाओं का फुल-ऑडिट, लगातार ड्रिल, और कड़े जुर्माने। कायदे से पालन हो या संयंत्र बंद।
- मजदूरों की आवाज़ को बल देना, उन्हें संगठित करना, अर्थशास्त्र से पहले मानवीय मुद्दा बनाना।
❓ और आप — क्या करेंगे?
ये सिर्फ ‘खबर’ नहीं है—ये उस परमुख्य सवाल का जवाब मांगती है:
क्या हम तब तक चुप रहेंगे जब तक किसी और मजदूर की लाश यहां नहीं गिरेगी?
या फिर इस त्रासदी को इस देश की आत्मा की तेज आवाज़ बनने देंगे?
