February 9, 2026
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उत्तर ग़ज़ा की तंग गलियों से निकली एक छोटी-सी बच्ची की तस्वीर आज पूरी दुनिया के दिल को चीर गई है। महज़ दो साल की उम्र, और कंधों पर पानी के दो भारी जरीकैन। ये वीडियो एक मामूली दृश्य नहीं, बल्कि ग़ज़ा में इंसानियत की दम तोड़ती चीख है।

उस नन्हीं बच्ची के डगमगाते क़दम, फटे-पुराने कैंप की कीचड़भरी ज़मीन, और उसके मासूम चेहरे पर थकी हुई आँखें – सब कुछ इस बात की गवाही देता है कि ग़ज़ा आज सिर्फ़ बमों से नहीं, भूख और प्यास से भी जल रहा है।

https://www.instagram.com/reel/DLAzh4HMqcZ/?igsh=YzljYTk1ODg3Zg==


क्या बचपन ऐसा होता है?

जब खेलने की उम्र में कोई बच्ची पानी ढोती दिखे, तो ये सिर्फ़ एक तस्वीर नहीं होती – ये सभ्यता के मुँह पर तमाचा होती है। इज़राइल की नाकेबंदी ने ग़ज़ा को एक खुले क़ैदखाने में बदल दिया है, जहाँ बच्चों को न दूध मिलता है, न दवा, न ही पीने का साफ़ पानी।

यूनीसेफ़ की रिपोर्ट बताती है कि ग़ज़ा में विस्थापित बच्चों को रोज़ाना मुश्किल से 1.5 से 2 लीटर पानी मिल रहा है – जबकि इंसान को जीवित रहने के लिए कम से कम 3 लीटर और गरिमापूर्ण जीवन के लिए 15 लीटर चाहिए। यानी यहाँ ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं रह गई – ज़िंदा रहने की मजबूरी बन गई है।

रफ़ा – जो बना है अंतिम शरण, वहाँ लाखों लोगों ने शरण ली है, जिनमें आधे मासूम बच्चे हैं। बारिश ने अब इन कैंपों को दलदल बना दिया है, जिससे हैजा जैसे जानलेवा बीमारियों का ख़तरा और बढ़ गया है।



और सबसे बड़ा ज़ख्म – मानसिक पीड़ा।


मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इन बच्चों का शरीर ही नहीं, बचपन भी बिखर रहा है। जिन आँखों में दुनिया देखने का सपना होना चाहिए, उनमें डर, भूख और निराशा ठहर गई है।

वो वीडियो अब महज़ एक क्लिप नहीं, दुनिया की संवेदना की कसौटी बन गई है।
ये बच्ची आज अकेली नहीं – वो एक प्रतीक बन चुकी है हर उस मासूम का, जो युद्ध और राजनीति के बीच कुचले जा रहे हैं।

अब सवाल यह नहीं कि ये हालात कैसे हुए। सवाल ये है – कब तक?
कब तक निर्दोष बच्चे इस दुनिया की बेरूखी की क़ीमत चुकाते रहेंगे?

अब वक़्त आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय आँखें खोले।
ये कोई राजनीति नहीं, इंसानियत का सवाल है। ग़ज़ा के बच्चों को हथियार नहीं, पानी चाहिए। गोलियां नहीं, ग़लियों में खेलना चाहिए। आँसू नहीं, बचपन चाहिए।

और ये मांग हम सबकी है – एक माँ की, एक पिता की, एक इंसान की।
क्योंकि जब एक बच्चा पानी के लिए रोता है, तो पूरी इंसानियत प्यास से मरती है।




लेखक: Zarina Chhibber
(वरिष्ठ संपादक एवं सामाजिक कार्यकर्ता)

#SaveGazaChildren #HumanityFirst #StopTheBlockade

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