February 5, 2026
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उत्तराखंड में जारी मूसलाधार बारिश ने एक बार फिर पहाड़ों की नाजुक सड़कों और पुलों की असलियत सामने ला दी है। चमोली ज़िले के जोशीमठ–मालारी मोटरमार्ग पर रविवार को भारी बारिश के कारण टमाक नदी उफान पर आ गई। नदी के तेज बहाव में यहां बना पुल बह गया, जिससे नीतिवैली के कई गाँव देश के बाकी हिस्सों से कट गए हैं।

पुल के बहते ही टूटा संपर्क

स्थानीय प्रशासन ने जानकारी दी कि पुल टूटने के बाद नीतिवैली की ओर जाने वाला रास्ता पूरी तरह बाधित हो गया है। इस इलाके के लाता, रैणी, सुराईथोटा और मलारी जैसे गाँव अब सड़क संपर्क से अलग हो चुके हैं। ग्रामीणों को जरूरत की सामग्री पहुँचाना मुश्किल हो गया है, और आपात स्थिति में निकासी एक बड़ी चुनौती बन गई है।

स्थानीय लोगों की परेशानियाँ

ग्रामीणों ने बताया कि पुल टूटने से उनका जीवन पूरी तरह ठप हो गया है। बाजार से जरूरी सामान लाना, बीमारों को अस्पताल पहुँचाना और बच्चों का स्कूल जाना सब बाधित हो गया है। एक ग्रामीण ने कहा, “यहां पहले भी बारिश में सड़कें टूटती रही हैं, लेकिन अब पुल बह जाने से हम बिल्कुल अलग-थलग पड़ गए हैं।”

प्रशासन की ओर से कदम

जिला प्रशासन और सीमा सड़क संगठन (BRO) की टीमें मौके पर पहुँच चुकी हैं। वैकल्पिक व्यवस्था के लिए अस्थायी पुल या बेली ब्रिज बनाने की योजना पर विचार चल रहा है। प्रशासन ने प्रभावित गाँवों में ज़रूरी सामग्री पहुंचाने के लिए हेलीकॉप्टर सेवा शुरू करने की संभावना जताई है।

बारिश का बढ़ता खतरा

मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों तक राज्य में भारी बारिश की चेतावनी दी है। पहाड़ी नदियाँ पहले से ही उफान पर हैं, जिससे भूस्खलन और सड़क अवरोध की घटनाएँ बढ़ रही हैं। आपदा प्रबंधन विभाग ने लोगों को सतर्क रहने और सुरक्षित स्थानों पर रहने की अपील की है।

चमोली और आपदाओं का इतिहास

चमोली ज़िला इससे पहले भी प्राकृतिक आपदाओं का गवाह रहा है। फरवरी 2021 में रैणी गाँव के पास ग्लेशियर टूटने से आई आपदा ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली थी और हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स को भारी नुकसान हुआ था। ताज़ा घटना ने एक बार फिर लोगों को असुरक्षित ढाँचे और आपदा प्रबंधन की चुनौतियों की याद दिला दी है।


उत्तराखंड के पहाड़ हर साल बारिश और प्राकृतिक आपदाओं से जूझते हैं। चमोली का पुल टूटना सिर्फ़ एक घटना नहीं, बल्कि यह संकेत है कि बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने की ज़रूरत कितनी ज़्यादा है। सवाल यह है कि क्या हम हर बार आपदा के बाद राहत पर ही निर्भर रहेंगे, या फिर ऐसी घटनाओं से पहले ही तैयारी करेंगे।


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