
आजकल सोशल मीडिया ने हर किसी को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच दे दिया है। इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स ने आम आदमी को भी ‘स्टार’ बना दिया है। लेकिन इसी आज़ादी का इस्तेमाल जब ज़िम्मेदारी से नहीं किया जाता, तो यह समाज के लिए चिंता का विषय बन जाता है। हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक महिला ट्रेन की सीट को पोल बनाकर उस पर डांस करती दिखाई दी। देखने वालों के लिए यह मनोरंजन का साधन हो सकता है, लेकिन असल में यह घटना कई गंभीर सवाल उठाती है।
सार्वजनिक संपत्ति का अपमान
रेलवे की सीटें यात्रियों के आराम और सुविधा के लिए बनाई जाती हैं, न कि मनोरंजन का साधन बनने के लिए। जब कोई व्यक्ति इसे डांस या स्टंट के लिए इस्तेमाल करता है, तो यह सिर्फ़ ट्रेन की सीट को नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि पूरे सार्वजनिक तंत्र का अपमान करता है। क्या हमें यह भूल जाना चाहिए कि इन सुविधाओं पर करोड़ों रुपये का टैक्सपेयर्स का पैसा खर्च होता है?
नैतिकता और समाजिक मूल्य
भारतीय समाज में हमेशा से “लोकलाज” यानी शर्म और सामाजिक मान्यताओं का बहुत महत्व रहा है। लेकिन अब सोशल मीडिया की चमक-दमक में यह सब पीछे छूटता नज़र आ रहा है। लाइक्स और व्यूज़ की भूख ने नैतिकता और ज़िम्मेदारी को कहीं दबा दिया है। ट्रेन जैसी सार्वजनिक जगह पर ऐसा डांस करना सिर्फ व्यक्तिगत छवि को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की मानसिकता पर सवाल खड़े करता है।
युवा पीढ़ी पर प्रभाव
आज की पीढ़ी सोशल मीडिया पर हीरे-सी चमकती है। जो भी वायरल होता है, वही ट्रेंड बन जाता है। ऐसे में जब सार्वजनिक जगहों पर इस तरह की हरकतें वायरल होती हैं, तो युवा उन्हें ‘फॉलो’ करने लगते हैं। मनोरंजन के नाम पर मर्यादा और ज़िम्मेदारी का संतुलन बिगड़ने लगता है। सवाल यह है कि क्या हम अपने बच्चों को यह सिखाना चाहते हैं कि किसी भी सार्वजनिक संपत्ति का दुरुपयोग करके रील बनाई जाए और उसे “क्रिएटिविटी” कहा जाए?
मनोरंजन बनाम अश्लीलता
यह सच है कि कला और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर किसी को रोक नहीं लगानी चाहिए। लेकिन जब वही कला सामाजिक मर्यादाओं और सार्वजनिक संपत्तियों के साथ खिलवाड़ करने लगे, तो उसे मनोरंजन नहीं, बल्कि अश्लीलता और लापरवाही कहा जाएगा। समाज को यह तय करना होगा कि वह किस तरह के कंटेंट को बढ़ावा देना चाहता है—जिम्मेदार और प्रेरणादायक, या फिर सस्ती लोकप्रियता पाने वाला।
ज़िम्मेदारी किसकी?
इस पूरे मामले में सवाल सिर्फ महिला के डांस का नहीं है, बल्कि दर्शकों की मानसिकता का भी है। अगर ऐसे वीडियो वायरल होते हैं, तो कहीं न कहीं हम सब इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। क्योंकि हम ही उन्हें शेयर करते हैं, उन्हें व्यूज़ और लाइक्स देकर प्रोत्साहित करते हैं। अगर समाज सच में बदलाव चाहता है, तो ऐसे कंटेंट को नज़रअंदाज़ करना ही सबसे बड़ा हथियार है।
सोशल मीडिया की दुनिया ने हमें अभिव्यक्ति की ताक़त दी है, लेकिन साथ ही यह ज़िम्मेदारी भी कि हम इसका इस्तेमाल समाज और देश की गरिमा बनाए रखने के लिए करें। ट्रेन की सीट पर डांस जैसी घटनाएँ सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक चेतावनी हैं कि कहीं हम अपनी संस्कृति और ज़िम्मेदारी को सस्ती लोकप्रियता की भेंट तो नहीं चढ़ा रहे।